'अरे पांडे जी मसाला अइसे बेचब अब बइन होई गवा हवे'
अच्छा कीन्हेओ भैया..'जउन बता दीनहयो'#
डरात नाही का..!! अबही पकर लयी जयिहे तुम्कहिया, जउन अईसे ब्येचा करत हउ 'खुल्लम खुल्ला'
हम ब्येच रहन हवे.. तुम्कयिया काहे का डर बा..?? ब्येच तुम राहे हव हुम्कहिया का...!
लो भैया....तुम तौ गुस्साये गए..हम तौ तुहार भले खातिर बोलत रहें...!
"तौ"... तुम ना डराओ फिर जउन हम बेचित हवे तौ
तुम्कहिया चाहि तौ बतावो...?? डराओ ना..!!लयी लेओ
हुम्कहिया काहे चाही...!! हम नाही खात इ "गोबरवा"
अरे हमार तौ धंधा ही यही हवे "एक पैर जेल मा एक पैर रेल मा"
बातचीत का लहजा कह ले या इंसानी फितरत हम इंसान अपने हाज़िरजवाबी के अंदाज़ से सामने वाले की बातो पर उसी को घोडा पछाड़ पटखनी देकर जिस सुकून का अनुभव करते है वो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता | टेढ़ी और खड़ी भाषा बोलने वाली ये संस्कृति भले ही सुनने वाले के कानो को सुखद अनुभूति न दे सके और ये एह्साह कराती हो की सामने वाले आखिर बात कर रहे है या शीत युध्द लड़ रहे है,पर इससे क्या फर्क पड़ता है | ऊपर हुई बातचीत के अंश यु ही रोज़मर्रा का सफ़र करते हुवे दो लोगो के बीच होते सुनी ,कहने को तो सामान्य पर बड़ी ही दिलचस्प लगी उनकी बाते ,जहा एक ओर हाथ में पान मसाले की रंग बिरंगी चमकीली पुडियो की झालर सजाये एक आदमी अपना सामान बेच रहा था और दुसरे सज्जन उस पर टिपण्णी करते हुए अपनी नेक सलाह दे रहे थे परन्तु अंत में सामने वाली की हाज़िरजवाबी पर लाजवाब होकर अपने खिसियाये चेहरे के साथ खुद ही चुप हो गए |गंगापारी संस्कृति कह ले या यूंपी- बिहार की अदा यहाँ हर इंसान अपने मिजाज़ में तुनक और ठसक लेकर चलता है ,सामान्यतः मिलनसार भी कहे जाने वाले हम सुसभ्य समाज के लोग अपनी हाज़िर जवाबी से सबको लाजवाब कर देते है |
अब बीरबल की ही हाज़िरजवाबी देख लीजिये ,इतने बड़े राजा 'अकबर' को भी अपनी हाज़िर जवाबी के दम पर झुका देते थे ,और अपनी बुध्दि की प्रसंशा करने पर मजबूर कर दिया करते थे ,पर एक बात अक्सर दिमाग में खटकती रहती है की आखिर अकबर को कौन सा सुकून मिलता था बीरबल से मुह की खाने में | इतना धैर्य एक राजा में होना प्रशंशनीय था ,जिसमे तनिक भी अभिमान की भावना न होना उस देश की प्रजा के लिए कितना सुखद रहा होगा | पर आज की इक्कीसवी शताब्दी के युग में ना राजा वैसा सहनशील है ना ही प्रजा ,हम अपनी मनमानी चलाने की आदत से भला कैसे बाज़ आ सकते है ,और अगर मान भी लेते है तो कब तक?पर छोड़िये भी ,हम सरकार की माने या अपने शौक की सुने | यदि हम सरकार की सुनने लगे तो रामराज्य आ जायेगा ,और इतना संतुलन बेचारा कलियुग कैसे संभाल पायेगा | पर हर बात पर तुनक मिजाजी होकर सामने वाले का मुह बंद कर देना शिष्टाचार नहीं कहलाता ,तथ्यात्मक पहलुओ को नज़रंदाज़ करते हुए और अपनी मनमानी करते हुए हमारे मन को क्षण मात्र का सुकून भले ही मिल जाये परन्तु ये हाज़िरजवाबी की कला कभी कभी हमे भारी भी पड़ जाती है और यदा-कदा विवादों को भी जन्म दे जाती है |
आजकल के नन्हे-मुन्नों की हाज़िरजवाबी के आगे तो बड़े बड़े भी लाजवाब हो जाते है और कभी कभी तो खम्बा नोचने की स्थिति में पहुच जाते है |खैर उनकी हाज़िर जवाबी और सूझ बूझ ये जरुर सिद्ध करती है की हमारी अगली पीढ़ी सुनिश्चित रूप से आइन्स्टीन और बीरबल का सम्मिश्रण होगी |इस बात को यही को ख़त्म करते हुए मुद्दे की बात पर वापस चलते है ,की हम तो हम है आज की जनता ने यह तय कर लिया है की 'जो करेंगे बिंदास करेंगे हम किसी से नहीं डरेंगे' | आखिर सरकार ने तो हमे विचारों की अभिव्यक्ति का हक दिया है ,फिर सरकार भले ही कितने बंधन क्यों ना लगा ले पर ज़मानत तो हमेशा तैयार ही रहेगी | १ मार्च से लागू पान मसाले की प्लास्टिक की पूड़ियों पर प्रतिबन्ध आज अपने प्रारंभिक दौर में कुछ ज्यादा सफल ना दिख रही हो और दिल में भले ही ये मलाल रह जाये की ये व्यवस्था भी पहले सी कुछ व्यवस्थाओ सी सफल साबित ना हो पाए ,परन्तु 'रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन ए डे' की तर्ज़ पर चलते हुवे हम धीरे धीरे अपनी मंजिल कभी ना कभी पा ही लेंगे |
accha hai...shuruat me padhne me dikkat hui laga ki padh hi nhi paunga but its very awesome ....
ReplyDeleteनेहा बहुत तेजी से आपकी लेखनी बेहतर हो रही है शुरुवाती पैराग्राफ थोडा छोटा कर दो बधाई
ReplyDeletebahut jabardast
ReplyDeletebadhiya
ReplyDeletenneha ji aap ka kya kahna........... apne bbau aur hume apne anidhya se vanchit rakha ...filhal kahna hain aap , kabhi fursat meli to mere bhi blog par padharen .anurag anant .blog -- anant ka dard bas google par type karen aur visit karen
ReplyDeletebhut acha likha hai.
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