सिनेमा हमेशा से ही समाज का प्रतिबिम्ब मानी जाती रही है ,या यूँ कह ले की जो समाज में घटित होता है वही सिनेमा में दिखाया जाता रहा है तथा जो बदलाव सिनेमा के ज़रिये लोगो तक पहुचाये जाते है उन्हें जनता आसानी से अपना भी लेती है | वेल्कम टू सज्जनपुर ,पीपली लाइव,आक्रोश जैसी कितनी ही फिल्मे आज के बदलते हुए सामाज की सोच को दर्शाती है और साथ ही साथ किसान आत्महत्या, आनर किलिंग जैसे गंभीर मुद्दों को भी उठाती है | सिनेमा के सुरुआती इतिहास में अछूत कन्या, .अंकुर, बूटपालिश, सद्गति, आदमी, सुजाता जैसी फिल्मो ने दलित प्रसंग पर फिल्म निर्माण किये और खूब वाहवाही भी बटोरी | मूलतः १९३० के दशक में पिछड़ा वर्ग अथवा हरिजन समाज के नाम से संबोधित किया जाने वाला ये वर्ग आज सरकारी आरक्षण की श्रेणी में गिना जाता है | सामान्यतः कर्महीन नेताओं का वोटबैंक मात्र बन के रह जाने वाले इस वर्ग को यह खबर भी नहीं है की समाज में इनके लिए इतना सब कुछ बना भी है |
कविताओं ,लेखो ,जीवनियों एवं उपन्यासों आदि के माध्यम से ज्यादातर लेखको ने इस समाज की पहचान पर उठते प्रश्नों पर प्रकाश डाला है | १९५९ में बनी पहली दलित महिला प्रधान फिल्म अछूत कन्या ने सिनेमा के परदे पर एक दलित युवती की असहज परिस्थितियों से लड़ते हुवे दर्शाया जिसे की खूब प्रचार मिला , १९६० के दशक में बाबाराव अंबेडकर ,महात्मा राव फूले आदि जैसे दलित नेताओं के चरित्र चित्रण पर भी एकाध फिल्मे बनायीं गयी | छोटे परदे का बहुत ही मशहूर धारावाहिक 'नीम का पेड़' में बुधई नामक गरीब दलित जाति के नौकर के किरदार के लिए पंकज कपूर के अभिनय को आज भी याद किया जाता है ,यह नाटक छोटे परदे की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ | वर्जस्ववादी समाज के तले डरे सहमे एवं अपेछाकृत रहने वाले तथा 'अबे' और 'तू' के उच्चारण से संबोधित किये जाने वाले गरीब मजदुर की भूमिका से उठकर "वेलकम टू सज्जनपुर " के पढ़े लिखे नौजवान राजू तक का सफ़र इसी बड़े परदे ने यु ही समय के साथ तय किया |
श्वेत-श्याम सिनेमा से लेकर रंग बदलती रंगीन तस्वीरो की दुनिया तथा उत्पीडन की चुप्पी से लेकर हक की लड़ाई लड़ने का साहस भी इसी सिनेमा ने ही जगाया | बदलते चेहरों और सामजिक रंग ढंग के साथ ही इस सिनेमा ने इसी गंभीर विषय की कई बार अनदेखी भी की | मशहूर फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल द्वारा निर्मित फिलम ' समर ' भी इसी अनदेखी का शिकार बन कर रह गयी ,जिसके निर्माण में भी उन्हें अनेको मुश्किलों का सामना करना पड़ा , उनके कथन अनुसार " यह फिल्म अपने देश में न दिखाई जाये ,और इसे मंचन के लिए फिल्मोत्सवो में भी भेज दिया जाये ,शायद वह एक आध पुरूस्कार भी जीत जाये और कुछ एक अच्छे तबके के बुद्धिजीवी इसे देखकर इसकी प्रशंसा भी कर दे और ये सिलसिला बस यही ख़त्म " इतने गंभीर विषय पर समाज की इतनी अवहेलना और उदासीनता आखिर किसलिए ? शायद इसके पीछे भी एक वजह है की हमारे देश में फिल्म निर्माण का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना मन जाता है ऐसे में वे निर्मित तो की जाती है परन्तु अपने लक्ष्य से और सत्य पहलुओ से भटक भी जाती है ,जिससे की बहुत सारे सामजिक और राजनीतिक मुद्दों की गूढता कही खो भी जाती है या ये कह ले की अतिरिक्त ज्ञान और समझ बाटना कभी कभी हानिकारक भी बन जाता है |
इस स्थिति का सबसे मजेदार उदहारण है फिल्म ' देवदास ' जिसमे पारो का चरित्र (शायद किसी छोटी जाती की स्त्री ) ही अपनी मूल भावना से परे होकर कहानी को मात्र एक प्रेम प्रसंग बना देना है | बहुत सी महिला (जाति) प्रधान फिल्मे जैसे रुदाली , सुजाता और अंकुर भी इसी विचारधारा को स्पष्ट करती नज़र आती है जिसमे वर्ग विशेष के उत्थान से हटकर सिर्फ उनकी परेशानियों को दर्शा कर ख़त्म कर दिया गया | ये फिल्मे जहा एक ओर दलित प्रधान मुद्दों पर सक्षमता से लड़ने से खुद को बचाती नज़र आती है वही कही न कही समाज के उन विचारो को भी स्पष्ट करती है जो ये है की चीज़े समाज का हिस्सा है भी और वर्जना का दंश भी झेल रही है |
हिंदी सिनेमा ही क्यों कितने सारे और भी उदाहरण मिल जायेंगे जिनमे दलित प्रधान विषयों और उनकी समस्याओ को दृष्टिगत किया गया हो , तमिल फिल्म ' बुद्धन नेवर स्लीप्स ' , 'पान्थालू पतिम्पुलु' भी इसी विषय पर आधारित रही | मशहूर फिल्म निर्माता नागेश कुकनूर जो की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक है उनकी फिल्म 'ये हौसला ' भी दलित प्रधान फिल्म है |
यूं ही चलती रही तो शायद ये बहस ख़त्म होने में अभी कुछ और वक़्त बाकी है ,पर इन सब विचारों और भावनाओ के साथ आखिर मानव जीवन कब तक बंधा रहेगा | ख़ैर , वो बदलाव - वो समाज जो इस वैमनस्य की भावना से परे सोचेगा वो वक़्त न जाने कब देखने को मिलेगा इसका उत्तर मैं नहीं दे सकती ,मगर ये जरुर कह सकती हूँ की वो समाज और वो लोग बहुत ही अस्वाभाविक और उच्चकोटि के बुध्दिजीवी कहलायेंगे जो की इस सामजिक विद्वेष के कारक को जड़ से समाप्त कर पाने में सक्षम होंगे | तब तक के लिए एक सवाल सोचने के लिए छोड़े जा रही हूँ की आखिर भेदभाव की यह भावना लिए कब तक समाज इन्ही खोखले विचारो पर खड़ा रह पायेगा...!!


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