मेरे मित्र की डायरी के कुछ पन्नो से ...जो दिल को बस यूं ही छू गए
जिंदगी में वो दौर भी आ गया जब लगता है की अब सब कुछ ख़त्म ...!!उम्मीद की आखिरी रौशनी भी बुझ चली है ....अब इस जिंदगी को आगे बढाने का कोई मतलब नहीं बनता जो की पहले ही अर्थहीन हो चुकी है ...और अगर बची भी है ??...तो ....!! अब करना भी क्या उसका ??...मैं टूट रहा हूँ ...इतना ज्यादा आहत हूँ की कोशिश भी नहीं कर पा रहा वापस चलने की ...!! लेश मात्र भी हिम्मत नहीं बची ...
चीज़े यूँ तो वक़्त के साथ बदल जाती है ...दुनिया का ये कटु सत्य मुझे मिलाकर दुनिया के सभी लोग जानते ही होंगे ...
मैं उन रिश्तो पर विश्वास नहीं करता था जो वक़्त के साथ बदल जाया करते थे ...मुझे विश्वास नहीं था उन बन्धनों पर भी जो भरोसे के नाम पर मन को बाँध लेने की कोशिश भी करते ...उस भरोसे में...और उस ढोंगपन में जो दुनिया अक्सर एक दुसरे के सामने प्यार और अपनत्व क्र नाम पर परोसती थी ....पर बदलाव शायद प्रकृति का कठोर नियम जो ठहरा ...और मुझे ये बदलाव भी मंज़ूर था ...सब कुछ अलग अलग सा हो गया था मेरे जीवन में ....वास्तविकता से परे एक दुनिया बसा ली थी ...वास्तविकता ...!! हा वास्तविकता...!! वही नहीं समझ पाया मैं !!...वक़्त चाहे कितने भी सुनहरे रंग के पर क्यूँ न दे दे ..उड़ने की वास्तविकता तो सुनहरे रंगों से परे ...ज़मीन पर लौट आने की है.. वो ही भूल गया था शायद....!!
वक़्त सब बदल देता है ...शोर-चमक-आगाज़ और खुशियाँ भी ... आज वक़्त है ..उन सभी यादों को विराम देने का ...उन यादों से अलग हो जाने का ....चाहे वो कितनी ही अपनी क्यूँ न हो ...क्यूँ की उन यादों को अपने साथ रखने का मतलब होगा मरी हुयी लाश को अपने सीने से चिपका कर बैठ जाना...जो अब अर्थहीन है...!उन यादों से दूर हो जाना ही तुम्हारी भलाई निहित करता है कितना भी कठोर हो जाऊ, पर सच को स्वीकार करना इतना आसान भी नहीं होगा ...बिलकुल ऐसा ही जिंदगी से जुड़े और लोगो के साथ भी होता है..वक़्त आता है और उन्हें जाना पड़ता है ...और कभी कभी बेबस होकर बंद मुट्ठीयों को भी खोलना पड़ता है ...
बस आज इसीलिए मैं 'त्यागना' चाहता हूँ
उस अपनत्व को..उस तल्लीनता से ...
उस बंधन को...उस पीड़ा से....
उस बेबसी को...उतनी ही दया से...
जो मेरे दिल के कोने में हमेशा तुम्हारे लिए थी..!!
त्यागना चाहता हूँ उस लगाव को जो तुममे था ..!!
'त्याग'...उन सभी झूटी बातों से ....
जो तुमने मुझसे यूं ही बोल दी थी कभी ..
'त्याग'...उन सभी सच्चे वादों से...
जो तुमने मुझसे यूं ही कर दिए थे कभी..
हार मानता हूँ उस आशा के लिए जिनका सहारा
लगाकर सोचता था ..एक दिन सब ठीक हो जायेगा ...!
हार गया उस दिन भी जब सब बिखर गया था ...
छोड़ दिया मैंने अब कोशिश करना भी..!!
क्यूँ की ...देखा है मैंने वो पल भी...
जब तुमने भावहीन होकर अनदेखा कर दिया था मुझे
मेरे नाम को तुम्हारे अपनों की गिनती से हटा,अलग किया था तुमने उस रोज़..
आँखे बंद कर ली थी तुमने मुझे रोता छोड़कर ...
बस उस रोज़ 'त्याग' दिया था मैंने भी जीना..!!
आंखें मेरी भी बंद हो गयी थी ....
.............'त्याग' दिया था मैंने भी जीना ...!!
जिंदगी में वो दौर भी आ गया जब लगता है की अब सब कुछ ख़त्म ...!!उम्मीद की आखिरी रौशनी भी बुझ चली है ....अब इस जिंदगी को आगे बढाने का कोई मतलब नहीं बनता जो की पहले ही अर्थहीन हो चुकी है ...और अगर बची भी है ??...तो ....!! अब करना भी क्या उसका ??...मैं टूट रहा हूँ ...इतना ज्यादा आहत हूँ की कोशिश भी नहीं कर पा रहा वापस चलने की ...!! लेश मात्र भी हिम्मत नहीं बची ...
चीज़े यूँ तो वक़्त के साथ बदल जाती है ...दुनिया का ये कटु सत्य मुझे मिलाकर दुनिया के सभी लोग जानते ही होंगे ...
मैं उन रिश्तो पर विश्वास नहीं करता था जो वक़्त के साथ बदल जाया करते थे ...मुझे विश्वास नहीं था उन बन्धनों पर भी जो भरोसे के नाम पर मन को बाँध लेने की कोशिश भी करते ...उस भरोसे में...और उस ढोंगपन में जो दुनिया अक्सर एक दुसरे के सामने प्यार और अपनत्व क्र नाम पर परोसती थी ....पर बदलाव शायद प्रकृति का कठोर नियम जो ठहरा ...और मुझे ये बदलाव भी मंज़ूर था ...सब कुछ अलग अलग सा हो गया था मेरे जीवन में ....वास्तविकता से परे एक दुनिया बसा ली थी ...वास्तविकता ...!! हा वास्तविकता...!! वही नहीं समझ पाया मैं !!...वक़्त चाहे कितने भी सुनहरे रंग के पर क्यूँ न दे दे ..उड़ने की वास्तविकता तो सुनहरे रंगों से परे ...ज़मीन पर लौट आने की है.. वो ही भूल गया था शायद....!!
वक़्त सब बदल देता है ...शोर-चमक-आगाज़ और खुशियाँ भी ... आज वक़्त है ..उन सभी यादों को विराम देने का ...उन यादों से अलग हो जाने का ....चाहे वो कितनी ही अपनी क्यूँ न हो ...क्यूँ की उन यादों को अपने साथ रखने का मतलब होगा मरी हुयी लाश को अपने सीने से चिपका कर बैठ जाना...जो अब अर्थहीन है...!उन यादों से दूर हो जाना ही तुम्हारी भलाई निहित करता है कितना भी कठोर हो जाऊ, पर सच को स्वीकार करना इतना आसान भी नहीं होगा ...बिलकुल ऐसा ही जिंदगी से जुड़े और लोगो के साथ भी होता है..वक़्त आता है और उन्हें जाना पड़ता है ...और कभी कभी बेबस होकर बंद मुट्ठीयों को भी खोलना पड़ता है ...
बस आज इसीलिए मैं 'त्यागना' चाहता हूँ
उस अपनत्व को..उस तल्लीनता से ...
उस बंधन को...उस पीड़ा से....
उस बेबसी को...उतनी ही दया से...
जो मेरे दिल के कोने में हमेशा तुम्हारे लिए थी..!!
त्यागना चाहता हूँ उस लगाव को जो तुममे था ..!!
'त्याग'...उन सभी झूटी बातों से ....
जो तुमने मुझसे यूं ही बोल दी थी कभी ..
'त्याग'...उन सभी सच्चे वादों से...
जो तुमने मुझसे यूं ही कर दिए थे कभी..
हार मानता हूँ उस आशा के लिए जिनका सहारा
लगाकर सोचता था ..एक दिन सब ठीक हो जायेगा ...!
हार गया उस दिन भी जब सब बिखर गया था ...
छोड़ दिया मैंने अब कोशिश करना भी..!!
क्यूँ की ...देखा है मैंने वो पल भी...
जब तुमने भावहीन होकर अनदेखा कर दिया था मुझे
मेरे नाम को तुम्हारे अपनों की गिनती से हटा,अलग किया था तुमने उस रोज़..
आँखे बंद कर ली थी तुमने मुझे रोता छोड़कर ...
बस उस रोज़ 'त्याग' दिया था मैंने भी जीना..!!
आंखें मेरी भी बंद हो गयी थी ....
.............'त्याग' दिया था मैंने भी जीना ...!!
