Thursday, November 15, 2012

इति ...!!!

थक रही हूँ .. विश्वास खो रही हूँ...दिमाग़ी और जज़्बाती दोनों ही रूपों से ...और शायद कही गहरे शारीरिक रूप से भी,या कह ले बहुत मजबूत हो गई हूँ ...पहले से कही ज्यादा ...मैं नहीं जानती ...ये वो नहीं जिसकी उम्मीद की थी !!...ये बदलाव मेरी सूची में थे ही नहीं .!...फिर भी ..ये जिंदगी है ..आप पूर्वावलोकन तो कर नहीं सकते जो है जैसी है निभानी है ..वैसे भी अगर देखा जाए तो  यह भाव तो हर किसी में है .और किसी में भी नहीं ..स्वीकार करो और आगे बढ़ो ...
इस तरह की बातचीत अक्सर होती रहती है ,कभी खुद से बुदबुदा कर या कभी मन ही मन ..पर कुछ प्रश्नों के जवाब हमेशा अधूरे रह जाते है ...एक बड़ा ही सरल सा मालूम होने वाला मुश्किल सवाल "आखिर कहा पहुचें ??आखिर क्या और कितना लक्ष्य को पाया ?..हर सुबह ,उठती हूँ कुछ बिखरे हुए "स्वयं" के टुकड़ो के साथ ..कोशिश ,उन्हें समेटने की ..पर हर रोज़ एक दूसरे टुकड़े को खोया हुआ पाती हूँ ...यह कभी समझ नहीं आता कि बदलाव इतना महत्वपूर्ण किसलिये ?..बनावटी होना इतना ज़रूरी क्यूँ ?...किसी भी भीड़ का हिस्सा बनने के लिये झूठा मुखौटा लगाना इतना जरूरी क्यूँ ?...आसपास मौजूद किसी भी चीज और लोगो के लिए ख़ुद को बदलना इतना ज़रूरी क्यूँ और पूछने पर ऐसे सुझाव पाना जो  शायद ही कोई ख़ुद अपनी जिंदगी में अपना सके ...या अपनाने का विचार भी करे !
    
बीतते हुवे दिनों के साथ आसपास मौजूद हर चीज़ से भरोसा उठता जा रहा है .... पर नहीं ...अब मैं उदासीन नहीं हूँ ...न ही चिन्तित ...न दुखी ...बस चकित हूँ ...चकित ..और आसपास घट रही घटनाओ को देखकर हंसी भी आती है .प्रेक्टिकल दुनिया है !!..लोग अपने जीवन को लेकर व्यवहार मूलक(pragmatic) है ...अपने भविष्य के लिए ,यहाँ तक सामाजिक उठ-बैठ के लिए भी !...हम दोस्त बनाते नहीं चुनते है ,प्यार में अचानक डूबते नहीं बल्कि नापतोल के देख समझ कर छांटते है ,....ऐसा भी नहीं ,की कुछ महसूस नहीं करते ...या यूँ कह ले की कुछ भी महसूस करने से बचते ज़रूर है . अपनी आँखें बंद करने के बाद ये सोचते हैं की दुनिया एक काल कोठरी है ,यहाँ सब काला है ....
ऐसी ही दुनिया में हम जीते है ...हां ,मेरा विश्वास करे ,एक दिन आप खुद भी सही निर्णय लेने से बचेंगे ,आपके सबसे घनिष्ट ही आपको अपने स्वार्थ हेतु इस्तेमाल करने से नहीं कतरायेंगे .आपके सर पर पैर रख आगे बढ़ जायेंगे ,क्यूँ की यही जिंदगी है ...न अच्छी और न ही बुरी ...बस जिंदगी है . और इस संघर्ष को ही हम इंसानों ने Survival of Fittest का नाम दिया है .
स्वीकारने में थोड़ी मुश्किल ...शायद मुझे पढ़कर आपको ये लगे की इस वक़्त मैं किसी तकलीफ या जीवन से उदासीन हूँ ..तो फिर एक बात मुझे स्पष्ट करने दे ..!! ...नहीं।। बिलकुल भी नहीं ...मैं लेश मात्र भी दुखी नहीं हूँ इस समय ..सच मानिए ,मैंने कभी भी खुद को इतना स्पष्ट नहीं समझा जितना की आज ...और इस दुनिया को भी इससे बेहतर नहीं पहचाना ...अपने दिलोदिमाग़ से कभी भी इतनी इमानदारी से सच नहीं बोला जितना की आज ...
मैं अभी भी नहीं जानती की मैंने सच को कितना पहचाना और निभाया है ,अभी तक मैंने जिंदगी जीने की शर्तें स्वीकारी भी है?मुझमे अच्छाई बची भी है?या मैं विद्रोही बन जाऊँगी ..!!....या फिर मैं बुत बन गयी हूँ जिस पर कुछ भी असर नहीं करता ...परन्तु हां ...इतना ज़रूर समझ चुकी हूँ ...इस निरंतर बदलती रहने वाली दुनिया में ...सिर्फ बदलाव ही स्थिर है ...

Wednesday, October 3, 2012

"To STOP train pull chain"(गाडी रोकने के लिए ज़ंजीर खीचें )

रेल ...!! छुक छुक गाडी ..!! दौड़ती -हांफती ...जिंदगी की हमसफ़र... हमकदम... रोजाना आढती से लेकर करोडो आमदनी वाले की भरोसेमंद . नन न ना ...माफ़ कीजियेगा !!...गैर भरोसेमंद ...सहगामिनी ...लेकिन क्या करे ?? बेचारी अकेली जान !! असंख्य कमियों ,छेड़खानियों को सहने और कसीदों को सुनने के बाद भी किसी आम भारतीय गृह-वधू सी घूंघट में छुपकर अपने परिवारी जनो का भरण पोषण ताउम्र सर झुका कर करती रहती .
मेरे जैसे आम इंसान का भी ...जिसे हर रोज़ की भाग दौड़ के लिए इसके सहारे रहना पड़ता है .स्टेशन पहुचते ही ... आह!! ये कमी ...!! वो परेशानी ...!! भीड़ भक्कड़ ...!! इतनी साड़ी आपI धापी...मेरी तरह इन सभी का सामना तो आप सब ने कभी न कभी तो किया ही होगा और ज़रूर ही बड़ी बेबाकी से मुह से ये लफ्ज़ भी निकले होंगे... 'रेलवे का तो सिस्टम ही खराब है'..लेकिन ये है बड़ी ही मजेदार तुकबंदी ... एक तो 'सिस्टम'...दूसरी 'खराब' ..!!
और किसी में हो न हो लेकिन देरी से आने के काम में पूरी तरह से वफादार ..! बिलकुल उसी टेलीफोन की कम्पनी वाले स्वान सी ,जो देर सवेर ही सही लेकिन आपकी सेवा को हाज़िर ज़रूर होगी..अजी इस रेल रुपी माया संसार के भी क्या कहने ? इसे नहीं जिया तो क्या ख़ाक जिया ??...तरह-तरह के अदभुत जीवो को खुद में समाये दौड़ने में माहिर ..एक अजीब तरह का प्राणी इसमें घेर के सफ़र करने का तो अपना जन्म सिध्द अधिकार मान बैठा है..आपका भी सामना कभी न कभी उससे ज़रूर हुवा होगा!! ..."रुमाल आरक्षण यात्री" ...देखने में हम और आप जैसा आम भोला भाला इंसान लेकिन भगवान् न करे की इनके तेज़ तेवरों से आपका सामना पड़े...साफ़ भाषा में बोले तो! एम्० एस० टी० धारक यात्री ...जी रूमाल आरक्षण इसलिए ! क्यूँ की इन्हें ट्रेन की खिड़की से रूमाल सीट पैर फेक कर अपनी जगह हथियाने में माहिरता हासिल होती है..इनका रूमाल ही इनका टिकट आरक्षण ..!!...इनकी लीला अक्सर मेमू पैसेंजर ट्रेनों में देखने को मिल जाएगी ...मेमू ट्रेन की लीला और अन्दर का माहोल दोनों के यदि बखान करने बैठ जाये तो सम्पूर्ण ग्रन्थ तैयार  हो जाए...

अजब गज़ब प्रवृत्ति के लोग देखने मिल जायेंगे यहाँ ,जिनको देखकर लाफ्टर शो सा आनंद मिल जायेगा ..जैसे की :एक अकेल अखबार को झांक झांक कर आठ नौ लोगो का पढ़ना ...पान मसाला खा कर 'खिड़की के पास वाली सीट प्राप्त व्यक्ति' के सामने जाकर बाहर पीक मारना और उसे ये जताना की उसने खिड़की वाली जगह हड़पकर कितना बड़ा अपराध कर दिया है ...धार्मिक रूप से चहल पहल वाले दिनों जैसे शनिवार- मंगलवार इत्यादि को कुछ अत्याधिक धार्मिक प्रवृत्ति लोग चिल्ला चिल्ला कर 'रेल' में सुन्दर काण्ड का पठन पाठन भी कर डालते है ,साथ ही साथ कुछ ऐसे भी, जो इसी बहती गंगा में हाँथ धोते चौपाईयों की लय-ताल पर ऊँगली थिरकाते और सर हिलाते, भक्ति करते भी दिख जायेंगे .. कुछ शरारती गाँव के डूड (DUDE) भाई जन जिन्हें अपने नए-नए चायनीज़ सेल फोन पर जलेबी-शीला को नचाये बगैर एक पल भी चैन नहीं मिलता ...इनके बीच कुछ गाँव की भोली मासूम सी औरतें जो अक्सर सीट पर न बैठकर डिब्बे के किसी कोने में उकडू बैठ जाने में ही अपनी भलाई मानती ...डिब्बों की दीवारों में खोद खोद कर उकेरी गयी अभद्र टिप्पणियाँ और गालियाँ ,अगर इनसे भी कुछ का मन न भरे तो वहाँ लगे स्विचों , लाइटों और पंखो तक को उखाड़ देने वाले लोग...

इतना सब कुछ तो सहती है हमारी रेल..!! पर फिर भी साल के तीन सौ पैंसठ दिन बिना किसी शिकायत ,बस चुपचाप मौन रहकर ,अडिग और सहनशील सी बनकर अपने काम में लगे रहने की सीख दे जाती . और यहाँ तक अपने रुकने - दौड़ने की लगाम भी हमारे हाँथ में थमा देती और डिब्बे की हर दूसरी सीट पर लिख देती "गाडी रोकने के लिए ज़ंजीर खींचे" या यूँ कह ले ये वही सिस्टम है जिसे हम इतना कोसते धिक्कारते है और एक तरफ़ा सोच के आवेश में यह भूल जाते की इसे ऐसा गन्दा हम सबने ही बनाया ...यह वही सिस्टम है जो एक तरफ हमें तरक्की की रफ़्तार तो देता है वही दूसरी तरफ इस पर लगाम लगाना भी सिर्फ हमारे बस में कर देता है ...पर समझना तो हमें खुद होगा की हम अपनी जिम्मेदारियों को थोडा-थोडा ही सही पर निभाये ज़रूर ...शायद हमारी इन्ही छोटी-छोटी बूंदों की बचत ही कल किसी प्यासे की प्यास बुझा सके ...सोचे ज़रूर ...!! क्युकी जो व्यवहार हम दूसरो से खुद के लिए नापसंद करते हैं उसे दूसरों के साथ करने में ज़रा भी नहीं हिचकते ...
सोच बदले...और अपनी गैर ज़िम्मेदार आदतों को भी ...शिकायतें करने में नहीं बल्कि उन्हें समझकर दूर करने की कोशिश करने में ही समझदारी है...

Thursday, September 27, 2012

Out From the Blues....

मेरे मित्र की डायरी के कुछ पन्नो से ...जो दिल को बस यूं ही छू गए

जिंदगी में वो दौर भी आ गया जब लगता है की अब सब कुछ ख़त्म ...!!उम्मीद की आखिरी रौशनी भी बुझ चली है ....अब इस जिंदगी को आगे बढाने का कोई मतलब नहीं बनता जो की पहले ही अर्थहीन हो चुकी है ...और अगर बची भी है ??...तो ....!! अब करना भी क्या उसका ??...मैं टूट रहा हूँ ...इतना ज्यादा आहत हूँ की कोशिश भी नहीं कर पा रहा वापस चलने की ...!! लेश मात्र भी हिम्मत नहीं बची ...
चीज़े यूँ तो वक़्त के साथ बदल जाती है ...दुनिया का ये कटु सत्य मुझे मिलाकर दुनिया के सभी लोग जानते ही होंगे ...  
मैं उन रिश्तो पर विश्वास नहीं करता था जो वक़्त के साथ बदल जाया करते थे ...मुझे विश्वास नहीं था उन बन्धनों पर भी जो भरोसे के नाम पर मन को बाँध लेने की कोशिश भी करते ...उस भरोसे में...और उस ढोंगपन में जो दुनिया अक्सर एक दुसरे के सामने प्यार और अपनत्व क्र नाम पर परोसती थी ....पर बदलाव शायद प्रकृति का कठोर नियम जो ठहरा ...और मुझे ये बदलाव भी मंज़ूर था ...सब कुछ अलग अलग सा हो गया था मेरे जीवन में ....वास्तविकता से परे एक दुनिया बसा ली थी ...वास्तविकता ...!! हा वास्तविकता...!! वही नहीं समझ पाया मैं !!...वक़्त चाहे कितने भी सुनहरे रंग के पर क्यूँ न दे दे ..उड़ने की वास्तविकता तो सुनहरे रंगों से परे ...ज़मीन पर लौट आने की है.. वो ही भूल गया था शायद....!!

 वक़्त सब बदल देता है ...शोर-चमक-आगाज़ और खुशियाँ भी ... आज वक़्त है ..उन सभी यादों को विराम देने का ...उन यादों से अलग हो जाने का ....चाहे वो कितनी ही अपनी क्यूँ न हो ...क्यूँ की उन यादों को अपने साथ रखने का मतलब होगा मरी हुयी लाश को अपने सीने से चिपका कर बैठ जाना...जो अब अर्थहीन है...!उन यादों से दूर हो जाना ही तुम्हारी भलाई निहित करता है कितना भी कठोर हो जाऊ, पर सच को स्वीकार करना इतना आसान भी नहीं होगा ...बिलकुल ऐसा ही जिंदगी से जुड़े और लोगो के साथ भी होता है..वक़्त आता है और उन्हें जाना पड़ता है ...और कभी कभी बेबस होकर बंद मुट्ठीयों को भी खोलना पड़ता है ...

बस आज इसीलिए मैं 'त्यागना' चाहता हूँ
उस अपनत्व को..उस तल्लीनता से ...
उस बंधन को...उस पीड़ा से....
उस बेबसी को...उतनी ही दया से...
जो मेरे दिल के कोने में हमेशा तुम्हारे लिए थी..!!
त्यागना चाहता हूँ उस लगाव को जो तुममे था ..!!
'त्याग'...उन सभी झूटी बातों से ....
जो तुमने मुझसे यूं ही बोल दी थी कभी ..
'त्याग'...उन सभी सच्चे वादों से...
जो तुमने मुझसे यूं ही कर दिए थे कभी..
हार मानता हूँ उस आशा के लिए जिनका सहारा
लगाकर सोचता था ..एक दिन सब ठीक हो जायेगा ...!
हार गया उस दिन भी जब सब बिखर गया था ...
छोड़ दिया मैंने अब कोशिश करना भी..!!
क्यूँ की ...देखा है मैंने वो पल भी...
जब तुमने भावहीन होकर अनदेखा कर दिया था मुझे
मेरे नाम को तुम्हारे अपनों की गिनती से हटा,अलग किया था तुमने उस रोज़..
आँखे बंद कर ली थी तुमने मुझे रोता छोड़कर ...
बस उस रोज़ 'त्याग' दिया था मैंने भी जीना..!!
आंखें मेरी भी बंद हो गयी थी ....
.............'त्याग' दिया था मैंने भी जीना ...!!

Wednesday, September 26, 2012

अंतर्मन की आवाजें ...!!

काश अगर मैं लिख सकती....की सच में मेरे मन के अन्दर कितना कुछ चल रहा है तो शायद पूरे खाली कागज़ पर काली लकीरे ही लकीरे बिछ जाएँगी... सिर्फ लकीरे !!... बिना किसी समानता के बनायीं हुयी ..न शब्द....न वाक्य ....बस पूरे पन्ने पर एक के उपर एक खिची हुयी....अभी इस वक़्त मेरी मनः स्तिथि भी यही ही है... पूर्ण रूप से अस्त व्यस्त ...या फिर खाली सारे विचार, एक साथ एक ही समय में एक ही जगह घूम रहे है जिनका अभी तक कोई निश्चित शब्द..निश्चित वाक्य ...नहीं बन पाया ....थक गयी हूँ ...निस्तब्ध हूँ ऐसा लगता है अकेली सड़क पर खड़ी चिल्ला रही हूँ ..उन सभी सवालों के जवाब देती हुयी चिल्ला रही हूँ जो कभी उठे थे ...उन सबका हसना मुझे पागल सा बना रहा है ये मुश्किल दौर अपनी जिंदगी में कभी नहीं माँगा था, जहा पूरा समय दिल और दिमाग आपस में कलह मचाते हुए समय बीत रहे है ...हारा हुवा.. और कमज़ोर सा महसूस कर रही हूँ खुद को...इतना कमज़ोर...की अपने अंतर्मन की शोर को दो घडी रुक कर चुप हो जाने को भी नहीं बोल पा रही ...आज जिंदगी में पहली बार घर में होना अच्छा लग रहा है
पापा ने एक बार मुझसे कहा भी था ...इस दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं जो तुम्हारे साथ तुम्हारी तकलीफों को अपना बना सके ...तुम्हारे दोस्त ...तुम्हारे अच्छे दोस्त ...यहाँ तक वक़्त आने पर तुम्हारा सबसे प्रिय भी तुम्हारा साथ छोड़ देंगे ...वो भी जिन्हें की तुम सबसे ज्यादा प्यार करती हो वो भी एक एक कर तुमसे दूर हो जायेंगे , ये लड़ाई अकेले ही लड़नी है तुम्हे ...किसी को भी अपना प्रिय मत बनाना ,आँख बूंद कर के भरोसा भी न ही करना ...ना ही किसी और के लिए दुनिया से लड़ना ...सिर्फ अपने लिए जीना !!! पर मैं भी वो सीख ज्यादा दिन गले से लगा कर जी नहीं पायी ...कितनी मूर्ख थी की भूल गयी ...छोटी सी बात ...की मेरी अपनी भी एक जिंदगी है ....दुसरो के लिए जीवन जीना कितना भारी पड़ता है ....कभी प्यार के लिए ...दोस्तों के लिए... कभी अनकहे रिश्तो के लिए ...!!
आज जब वापस मुड़ के देखती हूँ तो दुनिया को खुद पर हंसता हुआ पाती हूँ  क्यूँ की हर किसी ने जीना सीख लिया हर एक ने अपनी मंजिल तय कर ली हैं ...सीख लिया है की कैसे दूसरो से फायदा उठाया जाये ...
कुछ को नए रिश्ते , नए दोस्त भी मिल गए ...पर मैं वही खड़ी हूँ ...उसी सड़क पर...खामोश ...निस्तब्ध ...स्तम्भ सी ...मूर्खो की भाँती ...हर आने जाने वाले को निहारती ...!! उनकी खोज करती हुयी जो कल तक यही थे मेरे साथ !! पर आज कोई भी नहीं यहाँ ...वक़्त के साथ बीती आवाजें मुझे पागल बना रही है ...समझ नहीं आता दुनिया मुझ पर हंस रहीं है ??...या मैं दुनिया पर...??....