थक रही हूँ .. विश्वास खो रही हूँ...दिमाग़ी और जज़्बाती दोनों ही रूपों से ...और शायद कही गहरे शारीरिक रूप से भी,या कह ले बहुत मजबूत हो गई हूँ ...पहले से कही ज्यादा ...मैं नहीं जानती ...ये वो नहीं जिसकी उम्मीद की थी !!...ये बदलाव मेरी सूची में थे ही नहीं .!...फिर भी ..ये जिंदगी है ..आप पूर्वावलोकन तो कर नहीं सकते जो है जैसी है निभानी है ..वैसे भी अगर देखा जाए तो यह भाव तो हर किसी में है .और किसी में भी नहीं ..स्वीकार करो और आगे बढ़ो ...
इस तरह की बातचीत अक्सर होती रहती है ,कभी खुद से बुदबुदा कर या कभी मन ही मन ..पर कुछ प्रश्नों के जवाब हमेशा अधूरे रह जाते है ...एक बड़ा ही सरल सा मालूम होने वाला मुश्किल सवाल "आखिर कहा पहुचें ??आखिर क्या और कितना लक्ष्य को पाया ?..हर सुबह ,उठती हूँ कुछ बिखरे हुए "स्वयं" के टुकड़ो के साथ ..कोशिश ,उन्हें समेटने की ..पर हर रोज़ एक दूसरे टुकड़े को खोया हुआ पाती हूँ ...यह कभी समझ नहीं आता कि बदलाव इतना महत्वपूर्ण किसलिये ?..बनावटी होना इतना ज़रूरी क्यूँ ?...किसी भी भीड़ का हिस्सा बनने के लिये झूठा मुखौटा लगाना इतना जरूरी क्यूँ ?...आसपास मौजूद किसी भी चीज और लोगो के लिए ख़ुद को बदलना इतना ज़रूरी क्यूँ और पूछने पर ऐसे सुझाव पाना जो शायद ही कोई ख़ुद अपनी जिंदगी में अपना सके ...या अपनाने का विचार भी करे !
बीतते हुवे दिनों के साथ आसपास मौजूद हर चीज़ से भरोसा उठता जा रहा है .... पर नहीं ...अब मैं उदासीन नहीं हूँ ...न ही चिन्तित ...न दुखी ...बस चकित हूँ ...चकित ..और आसपास घट रही घटनाओ को देखकर हंसी भी आती है .प्रेक्टिकल दुनिया है !!..लोग अपने जीवन को लेकर व्यवहार मूलक(pragmatic) है ...अपने भविष्य के लिए ,यहाँ तक सामाजिक उठ-बैठ के लिए भी !...हम दोस्त बनाते नहीं चुनते है ,प्यार में अचानक डूबते नहीं बल्कि नापतोल के देख समझ कर छांटते है ,....ऐसा भी नहीं ,की कुछ महसूस नहीं करते ...या यूँ कह ले की कुछ भी महसूस करने से बचते ज़रूर है . अपनी आँखें बंद करने के बाद ये सोचते हैं की दुनिया एक काल कोठरी है ,यहाँ सब काला है ....
ऐसी ही दुनिया में हम जीते है ...हां ,मेरा विश्वास करे ,एक दिन आप खुद भी सही निर्णय लेने से बचेंगे ,आपके सबसे घनिष्ट ही आपको अपने स्वार्थ हेतु इस्तेमाल करने से नहीं कतरायेंगे .आपके सर पर पैर रख आगे बढ़ जायेंगे ,क्यूँ की यही जिंदगी है ...न अच्छी और न ही बुरी ...बस जिंदगी है . और इस संघर्ष को ही हम इंसानों ने Survival of Fittest का नाम दिया है .
स्वीकारने में थोड़ी मुश्किल ...शायद मुझे पढ़कर आपको ये लगे की इस वक़्त मैं किसी तकलीफ या जीवन से उदासीन हूँ ..तो फिर एक बात मुझे स्पष्ट करने दे ..!! ...नहीं।। बिलकुल भी नहीं ...मैं लेश मात्र भी दुखी नहीं हूँ इस समय ..सच मानिए ,मैंने कभी भी खुद को इतना स्पष्ट नहीं समझा जितना की आज ...और इस दुनिया को भी इससे बेहतर नहीं पहचाना ...अपने दिलोदिमाग़ से कभी भी इतनी इमानदारी से सच नहीं बोला जितना की आज ...
मैं अभी भी नहीं जानती की मैंने सच को कितना पहचाना और निभाया है ,अभी तक मैंने जिंदगी जीने की शर्तें स्वीकारी भी है?मुझमे अच्छाई बची भी है?या मैं विद्रोही बन जाऊँगी ..!!....या फिर मैं बुत बन गयी हूँ जिस पर कुछ भी असर नहीं करता ...परन्तु हां ...इतना ज़रूर समझ चुकी हूँ ...इस निरंतर बदलती रहने वाली दुनिया में ...सिर्फ बदलाव ही स्थिर है ...
इस तरह की बातचीत अक्सर होती रहती है ,कभी खुद से बुदबुदा कर या कभी मन ही मन ..पर कुछ प्रश्नों के जवाब हमेशा अधूरे रह जाते है ...एक बड़ा ही सरल सा मालूम होने वाला मुश्किल सवाल "आखिर कहा पहुचें ??आखिर क्या और कितना लक्ष्य को पाया ?..हर सुबह ,उठती हूँ कुछ बिखरे हुए "स्वयं" के टुकड़ो के साथ ..कोशिश ,उन्हें समेटने की ..पर हर रोज़ एक दूसरे टुकड़े को खोया हुआ पाती हूँ ...यह कभी समझ नहीं आता कि बदलाव इतना महत्वपूर्ण किसलिये ?..बनावटी होना इतना ज़रूरी क्यूँ ?...किसी भी भीड़ का हिस्सा बनने के लिये झूठा मुखौटा लगाना इतना जरूरी क्यूँ ?...आसपास मौजूद किसी भी चीज और लोगो के लिए ख़ुद को बदलना इतना ज़रूरी क्यूँ और पूछने पर ऐसे सुझाव पाना जो शायद ही कोई ख़ुद अपनी जिंदगी में अपना सके ...या अपनाने का विचार भी करे !
बीतते हुवे दिनों के साथ आसपास मौजूद हर चीज़ से भरोसा उठता जा रहा है .... पर नहीं ...अब मैं उदासीन नहीं हूँ ...न ही चिन्तित ...न दुखी ...बस चकित हूँ ...चकित ..और आसपास घट रही घटनाओ को देखकर हंसी भी आती है .प्रेक्टिकल दुनिया है !!..लोग अपने जीवन को लेकर व्यवहार मूलक(pragmatic) है ...अपने भविष्य के लिए ,यहाँ तक सामाजिक उठ-बैठ के लिए भी !...हम दोस्त बनाते नहीं चुनते है ,प्यार में अचानक डूबते नहीं बल्कि नापतोल के देख समझ कर छांटते है ,....ऐसा भी नहीं ,की कुछ महसूस नहीं करते ...या यूँ कह ले की कुछ भी महसूस करने से बचते ज़रूर है . अपनी आँखें बंद करने के बाद ये सोचते हैं की दुनिया एक काल कोठरी है ,यहाँ सब काला है ....
ऐसी ही दुनिया में हम जीते है ...हां ,मेरा विश्वास करे ,एक दिन आप खुद भी सही निर्णय लेने से बचेंगे ,आपके सबसे घनिष्ट ही आपको अपने स्वार्थ हेतु इस्तेमाल करने से नहीं कतरायेंगे .आपके सर पर पैर रख आगे बढ़ जायेंगे ,क्यूँ की यही जिंदगी है ...न अच्छी और न ही बुरी ...बस जिंदगी है . और इस संघर्ष को ही हम इंसानों ने Survival of Fittest का नाम दिया है .
स्वीकारने में थोड़ी मुश्किल ...शायद मुझे पढ़कर आपको ये लगे की इस वक़्त मैं किसी तकलीफ या जीवन से उदासीन हूँ ..तो फिर एक बात मुझे स्पष्ट करने दे ..!! ...नहीं।। बिलकुल भी नहीं ...मैं लेश मात्र भी दुखी नहीं हूँ इस समय ..सच मानिए ,मैंने कभी भी खुद को इतना स्पष्ट नहीं समझा जितना की आज ...और इस दुनिया को भी इससे बेहतर नहीं पहचाना ...अपने दिलोदिमाग़ से कभी भी इतनी इमानदारी से सच नहीं बोला जितना की आज ...
मैं अभी भी नहीं जानती की मैंने सच को कितना पहचाना और निभाया है ,अभी तक मैंने जिंदगी जीने की शर्तें स्वीकारी भी है?मुझमे अच्छाई बची भी है?या मैं विद्रोही बन जाऊँगी ..!!....या फिर मैं बुत बन गयी हूँ जिस पर कुछ भी असर नहीं करता ...परन्तु हां ...इतना ज़रूर समझ चुकी हूँ ...इस निरंतर बदलती रहने वाली दुनिया में ...सिर्फ बदलाव ही स्थिर है ...

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