Monday, March 28, 2011

“सत्य और पुन:पर्रामर्श":एक विचार- एक मंजिल




“गलतियां सशक्त और कमज़ोर दोनों ही तरह के लोग करते है ,परन्तु फर्क सिर्फ इतना है कि सशक्त वही कहलाता है जो गलतियाँ मानता है और कमज़ोर वो जो बहाने मारते है”

हमारा इतिहास शक्तिशाली राज्यों और देशो द्वारा छोटे राज्यों और उनकी भीतरी सत्ता पर अधिकार ज़माने का चलन और किस्सों पटा पडा है | सफ़ेद यूरोपियनो विशेष रूप से स्पेनिश और अमेरिका ने बहुत सी सभ्यताओ जैसे ‘माया’, ‘इनका’ और ‘एज़्टेक’ तक को खात्मे की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया | नोबल पुरुष्कार विजेता “डेसमंड टूटू’ ने कहा “जब सफ़ेद यहाँ आया था ,तो बुक (बाईबिल) था और अब देश है”| दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद नीति के खिलाफ शुरू हुए क़ानून “सत्य और पुन:पर्रामर्श आयोग” के गठन के पश्चात वहां श्वेतों के उत्पीडन से अश्वेतों के मौलिक अधिकारों के हनन और इसके बचाव पर पहली बार ध्यान दिया गया | नेल्सन मंडेला द्वारा चलाये गए टी. आर. सी. की सफलता ने दोनों ही उत्पीडक और उत्पीडित दोनों की ही स्थितियों को नैतिक रूप से सशक्त किया | जहा एक तरफ काले पीडितो को नफरत और प्रतिशोध से छुटकारा मिल गया वही दूसरी ओर सफ़ेद अपराधियों को उनके अपराध का बोध कराया |
हाल ही में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने टी.आर. सी. के गठन सम्बंधित सुझाव देते हुए कहा “लोगो को पता होना चाहिए की कैसे राज्य में उग्रवाद शुरू हुआ? बन्दूक संस्कृति कहा से आई ?हिरासत में हत्याओं ने जगह कैसे ली? सैकडो राजनीतिक कार्यकताओ को मार डाला गया ? कश्मीरी पंडितो के पलायन और यातना दिया जाना सही है या गलत ?” मामला सिर्फ कश्मीर का है तो वह कि परिस्थितियों को देखते हुए वहां इस क़ानून का गठन अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है ,उनके द्वारा दिया गया सुझाव काफी सराहनीय भी था |
न्याय की मांग के मुद्दे पर आज भी समाज में आज भी हर बार एक पक्ष दूसरे की खिलाफत में खड़ा रहता है | स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से लेकर अब तक भारत इसी दोराहे पर खड़ा रहा है | माओवाद, आरक्षण आन्दोलन, हजारो राजनीतिक हेर फेर ,सामाजिक उठा-पटक, अंतर्राष्ट्रीय तालमेल और ना जाने ऐसे ही कितनी समस्याओ से हमारा देश आज बहुत सी अनैतिक परिस्तिथियों में झूल रहा है ,ऐसे में सिर्फ सूचना का अधिकार क़ानून बना देना और कमज़ोर प्रचार सिर्फ अपना पल्ला मात्र झाड लेने जैसा कार्य करना हमारी समस्या का कोई उपाय नहीं दे सकेगा |ऐसे हालातो में जागरूकता आम इंसान तक पहुचना बड़ी बात नहीं ,अंजाम तक पहुचना बड़ी बात है| अतीत से दबे हुवे संघर्ष और बहस को फिर से खोलने और सुलझाने का प्रयास कभी कभी समाधान पाने के बजाय आतंरिक अशांति , गृह युद्ध ,तानाशाही ,आतंकवाद ,मानव अधिकारों का हनन आदि को जनम भी दे देती है | इन खामियों के बावजूद समय चक्र आज भी बदस्तूर वैसा ही चलता चला आ रहा है | ऐसे हालातो में टी. आर. सी. का गठन एक स्थायी समाधान साबित हो सकता है, हम भारतीयों को सामंजस्य, धर्मनिरपेक्षता में बांधकर अनिश्चितता कि सोच से उबारने का | लेकिन ऐसा लगता है कि सुलह का ये विचार अभी तक राजनीतिकरण और मन कि कल्पना मात्र बन चुका है ,यहाँ हर कोई अपना उल्लू सीधा करना चाहता है और इसी होड़ में एक दूसरे के गिरहबान पर ऊँगली उठाने पर भी नहीं हिचकता ‘आम इंसान’ | सुचारू रूप से मानव सभ्यता को विकास के क्रम से मिलाने कि जुगत में शायद यही रास्ता कोई मंजिल दे जाये हमे ,क्युकी गलतियाँ करना तो इंसान की फितरत है पर उन्ही गलतियों को सुधारकर उनसे सीख लेते हुए आगे को बढ़ना मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों को क्षितिज पार ले जाने का नियम |

Sunday, March 27, 2011

“तहज़ीब–ए-सफरनामा”

aasfi mosque -bada imaambada 
लखनऊ हम पर फिदा और हम फिदा ए लखनऊ,
क्या है ताक़त आसमां की ,हमसे छुड़ाए लखनऊ

ये खूबसूरत जज़्बात सिर्फ भावो को अपने शब्दों में बयाँ करने का तरीका ही नहीं बल्कि बताती है उस खूबसूरत शहर की दास्ताँ जो वक्त और और बदलाव की बयार में आज भी अपनी संस्कृति और तहज़ीब को संजोकर आगे बढ़ रहा है | यूँ तो लखनऊ से मेरा कोई ज़मीनी ताल्लुक नहीं था पर इन ४ सालो के लखनऊ के सफर ने इतना प्रभावित कर दिया की ये देश पराया होते हुए भी अपने से बढ़कर लगता है| सुनने में तो बहाने सा लगेगा की इस शहर में रहते ४ साल होने को आये पर असल लखनऊ
देखने का मौका कभी नहीं मिला ,पर लखनऊ किसी एक निश्चित जगह – मीनार ,गुम्बद से नहीं जाना जाता , लखनऊ को ‘लखनऊ’ बनाने के पीछे न जाने कितने ही कारण है : यहाँ की नजाकत-नाफाज़त ,तहज़ीब ,शायराना मिजाज़ ,यहाँ की शाम, कन्कव्वेबाज़ी ,चिकनकारी-ज़रदोज़ी ,रेवड़ी , दशहरी आम ,गलौटी कबाब-शीरमाल, कला-नृत्य, गंगा-जामुनी संस्कृति और सबसे महत्वपूर्ण यहाँ के खुशमिजाज़ लोग : ये सब मिलकर इस शहर को बाकी शहरो से बिलकुल जुदा बनाते है |नवाबो की परंपरागत पहचान को जिंदा रखने वाले इस शहर ने पूरी दुनिया में अपनी अलग मिसाल बना कर रखी है ,पूरे हिन्दुस्तान में आज भी अगर नरमदिल लोग और तहज़ीब की बोली कही सुनने को मिलेगी तो वो सिर्फ लखनऊ ही होगा ,अवधी खड़ी बोली की रीत निभाने वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ लखनऊ ही ऐसा शहर है जहा आज भी तहज़ीब और मीठी जुबां वाले लोग बहुताय मिलेंगे | पर वक्त की इसी आपाधापी में धीरे धीरे ये शहर अपनी पहचान भुलाने सा लगा था और इसी तर्ज़ पर लखनऊ नगर निगम और उत्तर प्रदेश टूरिस्म ने एक सम्मिलित प्रयास चालू किया अपनी इसी संस्कृति को बचाने का और इसी प्रयास के अंतर्गत “लखनऊ:हेरिटेज वाल्क” की सुरुवात की ,जिसे अपनी जुबान में आपसे बताने जा रही हूँ |


aasfee mosque
इतवार की सुबह निकल पडा हम १८-२० लोगो का काफिला पुराने लखनऊ की सैर को ,सुबह पूरी ताकत और स्फूर्ती से लबरेज हम मित्रजन निकल पड़े इस शहर की कुछ मीठी यादो को इकठ्ठा करने जिसमे सहायता की हमारे गाइड नावेद जिया साहब ने और शुरु हुआ हमारा सफर पुरानी टीले वाली मस्जिद से | लफ्जों को रबड़ी की तरह जल्दी जल्दी चाट कर बोलने वाले जिया साहब बड़े ही दिल्चस्प इंसान थे और ऐसे में उनका बात् चीत के आदान प्रदान का तरीके के कायल हम लोगो को टीले वाली मस्जिद दिखाने से हुई लखनऊ भ्रमण की शुरुआत | हज़रत शाहपीर की याद में निर्मित टीले वाली मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने कारवाया जिस कारण इसे आलमगीर मस्जिद के नाम से भी जानते है | वहां का वर्णन करते हुए जिया साहब कहते की टीले वाली मस्जिद लखनऊ के सबसे ऊंचे बने भवनों में से एक है | अदर क्वेश्चन ?? ऐनिबडी?? पूछते हुए जिया जी आगे को बढते है, वहां से निकल कर हम चले बड़े इमामबाडा की ओर वहा गेट पर खड़े होकर उन्होंने अपनी स्वनिर्मित अंग्रेजी भाषा में बताया “व्हेन एवर एनी डेंजर इस कमिंग एनी एनेंमी इस कमिंग देन एवर गार्ड इस वाचिंग फ्राम हिस् विव देन ही विल वेव हिस् फलेग टू शो डी मैंन वाचिंग फ्राम इनसाइड ,बट वि आर नाट एबल तो वाच हिम फ्राम हियर” ,व्हेन एवर को पूरा करते उनके देन एवर के शब्द बहुत ही मनोरंजक लगते थे |पर उनके भाव बहुत ही साफ़ थे जिसका मतलब बस इतना था की उस समय का सुरक्षा प्रणाली भी काफी सुदृण हुआ करती थी | इमामबाडा सिर्फ एक धार्मिक भवन था जो की ईराक के ग्यारहवे इमाम हुसैन के मकबरे की हमशक्ल है |यही दूसरी ओर आशि मस्जिद भी है जो की नवाबो की कौमी एकता भावना को भी दर्शाता है क्यों कि इसके दोनों गुम्बद में से एक गुम्बद में हिंदु मान्यता के अनुसार लक्ष्मणपुरी माने जाने वाले लखनऊ में लक्ष्मण का प्रतीक शेषनाग के फन भी बने हुए है और यहाँ की एक और खासियत है की यहाँ के ज़्यादातर भवनों में जगह जगह मछली के जोड़े भी बने हुए है | इंडो-इरानियन बनावट से मिलकर बनाये गए ये भवन नवाबो कि कौमी एकता कि मुहीम को बयाँ करने का तरीका भी था |
nawaabs of lucknow 
         इमामबाड़ा की एक और खासियत बताते हुए हमारे गाइड हमे बताते है की ये पूरा निर्माण लक्खोरी ईट और गारे से बनी हुई है जिसमे चूना पाउडर ,शहद ,मास्(मसूर) की दाल ,दही और सिंघाड़े के आटे को मिलाकर सारी बनावट और नक्काशी की गयी है , सुनने में बड़ा अजूबा लगा की एक इमारत २०० साल से भी ज्यादा के वक्त से इन सब सामानों के मिश्रण पर उसी तरह आज भी खड़ी है और आज के दौर के हमारे सीमेंट और मौरंग के ठोस घोल आज १० साल भी हमारे घरों को ठीक से टिका नहीं पाते | इमाम बाडे की सैर करने के बाद हमारे गाइड जिया साहब हमे ले गए लखनऊ की मशहूर पहलवान ठंडाई वाले की दूकान पर ताज़ी ताज़ी ठंडाई का हमे लुत्फ़ उठवाने के लिए ,ठंडाई वैसे तो हिन्दुस्तान में भगवान भोलेनाथ के प्रसाद के रूप में जानी जाती है और इसमें भांग (अंग्रेजी में ‘मैरिजुआना’ के नाम से जाना जाने वाला मादक पदार्थ) मिलाकर पीना लोग अपने शौक में भी शामिल करते है | ऐसे ही एक शौक़ीन देखने को मिले हमे एक जनाब जिनकी उम्र लगभग ९० वर्ष के आस पास की थी और वो हर रोज नियमानुसार उस दूकान पर भांग का सेवन करने आते है बिना किसी छुट्टी ,और दूकान के मालिक गुड्डू जी ने ये भी बताया की वहां लगभग हमेशा ऐसे शौक़ीन प्रवृत्ति लोग दूर दूर से आते है |
वहा से निकलकर जिया साहब को अलविदा कह हम उनके दो और सहयोगी गाइडो के साथ चल पड़े पुराना लखनऊ (चौक) की सैर को नयी फूल मंडी को पार करते हुए हम पहुचे लखनऊ की उन तंग गलियों में जो आज भी पुराने लखनऊ के नाम से जाना जाता है और साक्षी रहा है हमारे इतिहास का , हमारे नए गाइड आसिफ साहब बताते है की शायरों के शहर के नाम से भी जाना जाने वाले लखनऊ के किसी शायर ने फ़रमाया है :

“मर्द वो है जो मरदाना वार लड़ के मरे ,
मरे ज़रूर मगर मौत से लड़ कर मरे,
saleman from phool mandi 
न इक्के ताँगे-न बस से लड़ कर मरे ,
तेरी याद में एडी रगड-रगड के मरे
इसका तात्पर्य सिर्फ इतना था की जितने भी शायर बने सारे अपनी प्रेमिकाओ अथवा बीवियो की बेरुखी से आजिज़ आकर शायरी की राह चल पड़े थे ,वैसे मेरी अपनी सोच में तो ज्यादातर शायर किसी न किसी की बेवफाई या याद में तरस कर ही शायर बनते थे | खैर इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हम पहुच गए झरोखा बाजार यानी की वो बाज़ार जो की मशहूर था नर्तकियो के नृत्य-गायन के लिए,जहा दूर दूर से लोग आते थे गीत संगीत और नृत्य का आनंद लेने ,उस ज़माने में लोग यहाँ तहज़ीब-ओ-आदाब का तरीका मतलब उठने-बैठने ,खाने-पीने और रहन-सहन का तरीका सीखने जाया करते थे | पर आग और पानी ज्यादा दिन एक साथ रह नहीं सकते इसलिए यहाँ आने वाले मर्दों ने इस मोहल्ले को कला के बाजार से जिस्मफरोशी का बाजार बना दिया और बन के रह गया एक बदनाम मोहल्ला |

kalli ram temple 
            आसिफ जी जुबां सुनने में पूर्ण रूप से तहज़ीब परक थी ,उनके नपे तुले से लफ्ज़ और सलीके की आवाज़ उनकी अभिव्यक्ति को और स्वच्छ बना रही थी | आगे बढते हुए उन्होंने बताया की पुराने लखनऊ का पूरा बनावट ‘टाउन प्लानिंग सिस्टम’ पर आधारित थी जो की अनेको टोलों में बाटी गयी थी और हर टोले में तकरीबन सैकडो भवन आते थे और इनमें मौजूद हवेलियों और भवनों के द्वार छोटे और अन्दरूमी बनावट भव्य थी | घरों के मुख्य द्वार को देखकर अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था की अंदर इतनी शानदार इमारत भी हो सकती है | आगे बढते हुए हम पहुचे कल्ली राम के मंदिर जहा आज एक राम मंदिर बना हुआ है और बताया जाता है की इसी प्रांगण में मौजूद कुवे से आज से तकरीबन २०० साल पहले भगवान राम की काली रंग की मूर्ति प्राप्त हुयी थी जिसे की वहां के वंशज सिर्फ राम नवमी के दिन सबको दर्शन करवाने के लिए ही निकालते है | एक और दिलचस्प बात थी यहाँ की मूर्तियों की ,वो ये की वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध सीता जी की मूर्ती राम और लक्ष्मण के बीच स्तिथ है ,हालाकि मुझे ये तथ्य समझ नहीं आया की कुवे में तराशी हुई मूर्ति मिली ,दूसरी अगर काले रंग की थी तो काले तो कृष्ण भगवान भी थे तो उनकी क्यों नहीं और तीसरी अगर सीता जी की मूर्ती मध्य में थी (जो की दर्शाती थी सीता और लक्ष्मण के रिश्ते को) तो वो मूर्ति भगवान कृष्ण–सुभद्रा-बलराम की भी तो हो सकती थी और मेरी नज़र में तथ्यपूर्ण बात नहीं लगती,खैर इस विषय की बहस यही खत्म करते है |


begum nusrat fatima 
hukumnama of aurangzeb 
यूनानी सफाखाना और और उस समय की फ्रेंच मार्केट भी इसी मोहल्ले में मौजूद है जहा घोडो और नील का कारोबार हुआ करता था | फ्रेंच मार्केट एक कुवे के इर्द गिर्द बनी थी जहा आज उसी कुवे को पाटकर कपडे की दूकान बन चुकी है |फ्रेंच मार्केट के पीछे ही मौजूद फिरंगी महल जो की हमारी स्वाधीनता आन्दोलन का महत्वपूर्ण कालपिन्डो को अपने में छुपाये आज भी खड़ा है ,यहाँ की मौजूदा मालकिन बेगम नुसरत फातिमा जो की मुगलो की बारहवी पुश्त है उनसे मुलाक़ात करने का भी मौका मिला | इसी फिरंगी महल की एक दीवार पर अकबर और औरंगजेब का हुकुमनामा भी टंगा है जो ये बताता है की इस ज़मीन की मालिकाना हक़दार उनके पूर्वज और वे लोग रहेंगे , ‘बेगम फातिमा’ का दरियादिल और मिलनसार स्वभाव दिल को छू सा गया अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती है की “तब मैं क्लास ४ में थी जब इसी फिरंगी महल में मोतीलाल नेहरु ,सरोजिनी नाइडू , लाला लाजपत राय और भी कई स्वतन्त्रता सेनानियों ने ‘खिलाफत आन्दोलत’ की मीटिंग इस कमरे के नीचे मौजूद तैखाने (ऊँगली से एक कमरे की ओर इशारा करते हुए ) की थी | बहुत ही तराशी हुयी उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए वो अपने पुराने दिनों को याद करते हुए खुशी खुशी अपनी पूर्वजो की बाते बताती जा रही थी ,उनकी बातो में इतना खो गए हम सब की भूल ही गए की हमे वापस भी जाना है | वहा से निकलकर हम तंग और सकरी गलियों को पार करते जा रहे थे और वह मौजूद पुराने भवनों की नक्काशी और कारीगरी की बारीकी इतनी सुन्दर थी की बस नज़र ही नहीं हट रही थी |


लखनऊ इन सभी खूबियों के साथ साथ अपने खान पान और विशिष्ट शैली के लज़ीज़ व्यंजन के लिए भी दुनिया में मशहूर रहा है ,यहाँ मिलने वाला कबाब की भी अलग अलग तरह की किसमे जैसे गलावटी-कबाब, शामी-कबाब, बोटी-कबाब , पतीली के कबाब , घुटवा-कबाब , सीक-कबाब अपनी पहचान दुनिया भर की रसोईयो में बनाते है | महाराज हाजी मुराद अली के नाम की ‘मलाई की गिलोरी’ और 'काकोरी कबाब', खान प्रेमियों के बीच खासा लोकप्रिय हैं | बिरयानी ,मुगलई पराठा ,फिरनी ,मख्खन मलाई आदि व्यंजन लखनऊ शहर वासियों की ही नहीं बल्कि हर खाने के शौक़ीन के दिल में बसता है| अब जब लखनऊ के खाने की इतनी तारीफ सुन ही रखी थी और यहाँ के स्वाद से जुबान अच्छे से वाकिफ थी तो इतना घूमने फिरने के बाद हमारे पेट में चूहों का कूदना स्वाभाविक था और हम जा पहुचे चौक के मशहूर “टुंडे कबाबी” की दूकान और वह के गलावटी कबाब और शीरमाल का भरपूर आनंद लिया | समय के बदलते स्वरुप और वक्त की मांग ने भले ही आज के इंसान को फास्ट फ़ूड और इंस्टेंट मिक्स का लती बना दिया हो बस इस भाग दौड की दुनिया में लखनऊ की नवाबी खाने की महक आज भी वैसी ही है,और भीड़ पहले से भी ज्यादा |
tunday kabaabi

पेट पूजा के बाद हम वापस पहुचे इन्ही गलियों को देखने : चिकनकारी और ज़र्दोजी के काम के लिए मशहूर लखनऊ की पुरानी चौक मंडी और अपने काम में तत्परता से लगे यहाँ के क्म्प्युट्राइज्ड कारीगर,चांदी को पीटकर वर्क बनाते कारीगर ,नमाजी और लखनवी गलावटी कबाब-बिरयानी की दूकान से आती लज़ीज़ पकवानों की महक पूरे माहोल को और यादगार बना रही थी |और बस यही वक्त था अपने गाइड जनाब आसिफ और नवाबी नाफाज़त के माहोल से अलविदा लेने का और वापस लौट कर आने का इन्ही कुछ यादो को ज़हन में समेटकर |

Monday, March 21, 2011

भारत बनाम इण्डिया


'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहा है' इन्कलाब देश भक्ति के गीत संगीत और संवाद को बया करते ये बोल आज के दौर में सतही प्रभाव जताते होंगे , वाद विवाद के दृष्टिकोंड से ये बाते भले ही मजबूत तर्क वितर्क कमा ले | पर सच तो यही है की आज हमे हमारी देशभक्ति याद दिलाने और उसे महसूस करने के लिए मल्टीप्लेक्सों में सिनेमा शुरू होने के पांच मिनट पहले राष्ट्रीय गान बजने पर उसके आदर और सम्मान में मजबूरन शर्मशुदा होकर खड़ा होना पड़ता है |समाज सिनेमा और साहित्य ये आपस में समानांतर रूप से एक दुसरे के पूरक और अच्छा साहित्य सिनेमा के लिए मददगार साबित होता है पर आज के सिनेमा से साहित्य की पकड़ धीरे धीरे छूटती जा रही है | आज के दौर की सिनेमा जहा अपने वास्तविक रूप से बिलकुल अलग हट कर नए समाज को दर्शाती है वही दर्शको की नयी पीढ़ी की सोच को भी वर्णित करती है|

खेत खलिहान और हाट बाज़ार के इर्द गिर्द घूमती पुराने दौर की फिल्मे जहा असल भारत की पहचान हुआ करती थी वही आज उनकी जगह है हाई टेक माल और बड़े बड़े शहरो ने ले ली है | मध्यम वर्ग बहुल आबादी वाले देश ने संयुक्त परिवारों को नयूक्लियर परिवारों में तब्दील ही नहीं किया बल्कि आम आदमी की सोच पर ऐसा असर डाला की वो अपने ही परिद्रश्य से मुह छुपाने लगे है | मशहूर अभिनेत्री दीप्ति नवल कहती है "अच्छा साहित्य अच्छा सिनेमा तैयार करता है' |ज़मीनी सच्चाई से दूर आज का दौर साहित्य से खुद को पहले की भाति जोड़ नहीं पता ये बदलाव आखिरकार कितना कारगर साबित होगा ये बता पाना आज तो संभव नहीं | अभिनेता अब गाँव से निकल कर कनाडा-अमेरिका के फ़ार्म हॉउस में करोडो का बिसनेस करता दीखता है ,हीरोइने अब घागरा चोली से निकल कर जींस टॉप और शोर्ट्स में ज्यादा आरामदेह अनुभव महसूस करती है जो की वास्तविक हिन्दुस्तानी परिवेश से कोई लेना देना नहीं रखती ,आज का भारतीय आज भी खुले खेतो के ओट में चारपाई पर लेटे आसमान ताकते और तारे गिनते गुजारता है ,औसतन भारतीय हर शाम देसी दारु के अड्डे में पौवा पीते गुज़ार रहा है उसका पब डिस्को में जा कर देर रात बैठना तो दूर की बात वहा जाने और वहा के खर्चे के बारे में सोचता तक नहीं | आज के मल्टीप्लेक्सों में औसतन फिल्म देखने का खर्चा १५० से लेकर २५० के बीच होता है जो की हमे धड़ल्ले से खर्च करने में ज़रा भी नहीं हिचकाती और वही दूसरी ओर हम रिक्शेवाले को दो रुपया बढ़ा कर मांग लिए इसलिए घंटो उनसे लड़ डालते है| हम युवा जन आखिर ऐसी संस्कृति के प्रति इतने आकर्षित क्यों भला..!! इस देश ने बदलाव का खुले दिल से स्वागत तो किया पर उस बदलाव को अपने मूल्यों और सोच में न बिठा पाया , हम आज भी बड़े बड़े मूल्यों और उसूलो की धमक दिखाने वाले रूढ़िवादी समझ वाले मानुष ही है |लीक से हटकर बनने वाली समानांतर सिनेमा भारतीय परिवेश की ज़मीनी सच्चाई से अवगत तो कराती है पर सिर्फ कुछ खास दर्शक वर्ग ही जूटा पाती है इसका एक बड़ा कारण हमारी खुद की रूढ़िवादी समझ ही कही जा सकती है ,उदारीकरण से वैश्वीकरण के ओर बढ़ते इस देश ने पश्चिमी सभ्यता में ऐसा क्या आराम पाया की अपनी जड़ो को काटने में तनिक भी देर नहीं लगायी बीते दो दशको में आये छोटे और बड़े पर्दों की दुनिया ने हमारे सोच और मूल्यों को इतना प्रभावित किया की हम सच में मदर इण्डिया की मेहनतकश और जुझारू पीढी से सास बहु सीरीअल की आरामपसंद और दिखावावाद के परिवेश को ओढ़ के अपनी वास्तविकता को छुपाने लगे है | जिस देश में आज भी बड़ा भारी तबका सिर्फ गावो में बसर करता है और चौबीस में से अट्ठारह घंटे बिना बिजली के रहता है और हर सौ में से अस्सी भारतीय गाँव से जुड़ा होने के बावजूद अपने असल जुड़ाव से अलग होना चाहता है|

बदलाव तो समय की नियति है इंसान बदलता है तो समाज भी बदलता है बदलाव के इस दौर में हम अपने आप को सर से लेकर पाँव तक लेकर अलग रंग में रंगा पाते है पर ज़रूरी ये है की इन सब के बीच बदलाव की बयार में हम खुद को कितना स्थिर रख पाते है और संतुलन बना पाते है | 'देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान् कितना बदल गया इंसान' ये गाना तो किसी संगीतकार ने बरसो पहले गाया था पर ज़मीनी सच्चाई को दर्शाते ये बोल सच में कितने सार्थक है इसे हम आज महसूस कर रहे है|

Monday, March 7, 2011

बहुत कठिन है डगर पनघट की ...


'अरे पांडे जी मसाला अइसे बेचब अब बइन होई गवा हवे'

अच्छा कीन्हेओ भैया..'जउन बता दीनहयो'#

डरात नाही का..!! अबही पकर लयी जयिहे तुम्कहिया, जउन अईसे ब्येचा करत हउ 'खुल्लम खुल्ला'

हम ब्येच रहन हवे.. तुम्कयिया काहे का डर बा..??

ब्येच तुम राहे हव हुम्कहिया का...!

लो भैया....तुम तौ गुस्साये गए..हम तौ तुहार भले खातिर बोलत रहें...!

"तौ"... तुम ना डराओ फिर जउन हम बेचित हवे तौ
तुम्कहिया चाहि तौ बतावो...?? डराओ ना..!!लयी लेओ

हुम्कहिया काहे चाही...!! हम नाही खात इ "गोबरवा"

अरे हमार तौ धंधा ही यही हवे "एक पैर जेल मा एक पैर रेल मा"


          बातचीत का लहजा कह ले या इंसानी फितरत हम इंसान अपने हाज़िरजवाबी के अंदाज़ से सामने वाले की बातो पर उसी को घोडा पछाड़ पटखनी देकर जिस सुकून का अनुभव करते है वो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता | टेढ़ी और खड़ी भाषा बोलने वाली ये संस्कृति भले ही सुनने वाले के कानो को सुखद अनुभूति न दे सके और ये एह्साह कराती हो की सामने वाले आखिर बात कर रहे है या शीत युध्द लड़ रहे है,पर इससे क्या फर्क पड़ता है | ऊपर हुई बातचीत के अंश यु ही रोज़मर्रा का सफ़र करते हुवे दो लोगो के बीच होते सुनी ,कहने को तो सामान्य पर बड़ी ही दिलचस्प लगी उनकी बाते ,जहा एक ओर हाथ में पान मसाले की रंग बिरंगी चमकीली पुडियो की झालर सजाये एक आदमी अपना सामान बेच रहा था और दुसरे सज्जन उस पर टिपण्णी करते हुए अपनी नेक सलाह दे रहे थे परन्तु अंत में सामने वाली की हाज़िरजवाबी पर लाजवाब होकर अपने खिसियाये चेहरे के साथ खुद ही चुप हो गए |गंगापारी संस्कृति कह ले या यूंपी- बिहार की अदा यहाँ हर इंसान अपने मिजाज़ में तुनक और ठसक लेकर चलता है ,सामान्यतः मिलनसार भी कहे जाने वाले हम सुसभ्य समाज के लोग अपनी हाज़िर जवाबी से सबको लाजवाब कर देते है |
          अब बीरबल की ही हाज़िरजवाबी देख लीजिये ,इतने बड़े राजा 'अकबर' को भी अपनी हाज़िर जवाबी के दम पर झुका देते थे ,और अपनी बुध्दि की प्रसंशा करने पर मजबूर कर दिया करते थे ,पर एक बात अक्सर दिमाग में खटकती रहती है की आखिर अकबर को कौन सा सुकून मिलता था बीरबल से मुह की खाने में | इतना धैर्य एक राजा में होना प्रशंशनीय था ,जिसमे तनिक भी अभिमान की भावना न होना उस देश की प्रजा के लिए कितना सुखद रहा होगा | पर आज की इक्कीसवी शताब्दी के युग में ना राजा वैसा सहनशील है ना ही प्रजा ,हम अपनी मनमानी चलाने की आदत से भला कैसे बाज़ आ सकते है ,और अगर मान भी लेते है तो कब तक?पर छोड़िये भी ,हम सरकार की माने या अपने शौक की सुने | यदि हम सरकार की सुनने लगे तो रामराज्य आ जायेगा ,और इतना संतुलन बेचारा कलियुग कैसे संभाल पायेगा | पर हर बात पर तुनक मिजाजी होकर सामने वाले का मुह बंद कर देना शिष्टाचार नहीं कहलाता ,तथ्यात्मक पहलुओ को नज़रंदाज़ करते हुए और अपनी मनमानी करते हुए हमारे मन को क्षण मात्र का सुकून भले ही मिल जाये परन्तु ये हाज़िरजवाबी की कला कभी कभी हमे भारी भी पड़ जाती है और यदा-कदा विवादों को भी जन्म दे जाती है |
          आजकल के नन्हे-मुन्नों की हाज़िरजवाबी के आगे तो बड़े बड़े भी लाजवाब हो जाते है और कभी कभी तो खम्बा नोचने की स्थिति में पहुच जाते है |खैर उनकी हाज़िर जवाबी और सूझ बूझ ये जरुर सिद्ध करती है की हमारी अगली पीढ़ी सुनिश्चित रूप से आइन्स्टीन और बीरबल का सम्मिश्रण होगी |इस बात को यही को ख़त्म करते हुए मुद्दे की बात पर वापस चलते है ,की हम तो हम है आज की जनता ने यह तय कर लिया है की 'जो करेंगे बिंदास करेंगे हम किसी से नहीं डरेंगे' | आखिर सरकार ने तो हमे विचारों की अभिव्यक्ति का हक दिया है ,फिर सरकार भले ही कितने बंधन क्यों ना लगा ले पर ज़मानत तो हमेशा तैयार ही रहेगी | १ मार्च से लागू पान मसाले की प्लास्टिक की पूड़ियों पर प्रतिबन्ध आज अपने प्रारंभिक दौर में कुछ ज्यादा सफल ना दिख रही हो और दिल में भले ही ये मलाल रह जाये की ये व्यवस्था भी पहले सी कुछ व्यवस्थाओ सी सफल साबित ना हो पाए ,परन्तु 'रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन ए डे' की तर्ज़ पर चलते हुवे हम धीरे धीरे अपनी मंजिल कभी ना कभी पा ही लेंगे |

Wednesday, March 2, 2011

अछूत बाइस्कोप की नज़र से ......

सिनेमा हमेशा से ही समाज का प्रतिबिम्ब मानी जाती रही है ,या यूँ कह ले की जो समाज में घटित होता है वही सिनेमा में दिखाया जाता रहा है तथा जो बदलाव सिनेमा के ज़रिये लोगो तक पहुचाये जाते है उन्हें जनता आसानी से अपना भी लेती है | वेल्कम टू सज्जनपुर ,पीपली लाइव,आक्रोश जैसी कितनी ही फिल्मे आज के बदलते हुए सामाज की सोच को दर्शाती है और साथ ही साथ किसान आत्महत्या, आनर किलिंग जैसे गंभीर मुद्दों को भी उठाती है | सिनेमा के सुरुआती इतिहास में अछूत कन्या, .अंकुर, बूटपालिश, सद्गति, आदमी, सुजाता जैसी फिल्मो ने दलित प्रसंग पर फिल्म निर्माण किये और खूब वाहवाही भी बटोरी | मूलतः १९३० के दशक में पिछड़ा वर्ग अथवा हरिजन समाज के नाम से संबोधित किया जाने वाला ये वर्ग आज सरकारी आरक्षण की श्रेणी में गिना जाता है | सामान्यतः कर्महीन नेताओं का वोटबैंक मात्र बन के रह जाने वाले इस वर्ग को यह खबर भी नहीं है की समाज में इनके लिए इतना सब कुछ बना भी है |

कविताओं ,लेखो ,जीवनियों एवं उपन्यासों आदि के माध्यम से ज्यादातर लेखको ने इस समाज की पहचान पर उठते प्रश्नों पर प्रकाश डाला है | १९५९ में बनी पहली दलित महिला प्रधान फिल्म अछूत कन्या ने सिनेमा के परदे पर एक दलित युवती की असहज परिस्थितियों से लड़ते हुवे दर्शाया जिसे की खूब प्रचार मिला , १९६० के दशक में बाबाराव अंबेडकर ,महात्मा राव फूले आदि जैसे दलित नेताओं के चरित्र चित्रण पर भी एकाध फिल्मे बनायीं गयी | छोटे परदे का बहुत ही मशहूर धारावाहिक 'नीम का पेड़' में बुधई नामक गरीब दलित जाति के नौकर के किरदार के लिए पंकज कपूर के अभिनय को आज भी याद किया जाता है ,यह नाटक छोटे परदे की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ | वर्जस्ववादी समाज के तले डरे सहमे एवं अपेछाकृत रहने वाले तथा 'अबे' और 'तू' के उच्चारण से संबोधित किये जाने वाले गरीब मजदुर की भूमिका से उठकर "वेलकम टू सज्जनपुर " के पढ़े लिखे नौजवान राजू तक का सफ़र इसी बड़े परदे ने यु ही समय के साथ तय किया |

श्वेत-श्याम सिनेमा से लेकर रंग बदलती रंगीन तस्वीरो की दुनिया तथा उत्पीडन की चुप्पी से लेकर हक की लड़ाई लड़ने का साहस भी इसी सिनेमा ने ही जगाया | बदलते चेहरों और सामजिक रंग ढंग के साथ ही इस सिनेमा ने इसी गंभीर विषय की कई बार अनदेखी भी की | मशहूर फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल द्वारा निर्मित फिलम ' समर ' भी इसी अनदेखी का शिकार बन कर रह गयी ,जिसके निर्माण में भी उन्हें अनेको मुश्किलों का सामना करना पड़ा , उनके कथन अनुसार " यह फिल्म अपने देश में न दिखाई जाये ,और इसे मंचन के लिए फिल्मोत्सवो में भी भेज दिया जाये ,शायद वह एक आध पुरूस्कार भी जीत जाये और कुछ एक अच्छे तबके के बुद्धिजीवी इसे देखकर इसकी प्रशंसा भी कर दे और ये सिलसिला बस यही ख़त्म " इतने गंभीर विषय पर समाज की इतनी अवहेलना और उदासीनता आखिर किसलिए ? शायद इसके पीछे भी एक वजह है की हमारे देश में फिल्म निर्माण का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना मन जाता है ऐसे में वे निर्मित तो की जाती है परन्तु अपने लक्ष्य से और सत्य पहलुओ से भटक भी जाती है ,जिससे की बहुत सारे सामजिक और राजनीतिक मुद्दों की गूढता कही खो भी जाती है या ये कह ले की अतिरिक्त ज्ञान और समझ बाटना कभी कभी हानिकारक भी बन जाता है |

इस स्थिति का सबसे मजेदार उदहारण है फिल्म ' देवदास ' जिसमे पारो का चरित्र (शायद किसी छोटी जाती की स्त्री ) ही अपनी मूल भावना से परे होकर कहानी को मात्र एक प्रेम प्रसंग बना देना है | बहुत सी महिला (जाति) प्रधान फिल्मे जैसे रुदाली , सुजाता और अंकुर भी इसी विचारधारा को स्पष्ट करती नज़र आती है जिसमे वर्ग विशेष के उत्थान से हटकर सिर्फ उनकी परेशानियों को दर्शा कर ख़त्म कर दिया गया | ये फिल्मे जहा एक ओर दलित प्रधान मुद्दों पर सक्षमता से लड़ने से खुद को बचाती नज़र आती है वही कही न कही समाज के उन विचारो को भी स्पष्ट करती है जो ये है की चीज़े समाज का हिस्सा है भी और वर्जना का दंश भी झेल रही है |



हिंदी सिनेमा ही क्यों कितने सारे और भी उदाहरण मिल जायेंगे जिनमे दलित प्रधान विषयों और उनकी समस्याओ को दृष्टिगत किया गया हो , तमिल फिल्म ' बुद्धन नेवर स्लीप्स ' , 'पान्थालू पतिम्पुलु' भी इसी विषय पर आधारित रही | मशहूर फिल्म निर्माता नागेश कुकनूर जो की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक है उनकी फिल्म 'ये हौसला ' भी दलित प्रधान फिल्म है |

यूं ही चलती रही तो शायद ये बहस ख़त्म होने में अभी कुछ और वक़्त बाकी है ,पर इन सब विचारों और भावनाओ के साथ आखिर मानव जीवन कब तक बंधा रहेगा | ख़ैर , वो बदलाव - वो समाज जो इस वैमनस्य की भावना से परे सोचेगा वो वक़्त न जाने कब देखने को मिलेगा इसका उत्तर मैं नहीं दे सकती ,मगर ये जरुर कह सकती हूँ की वो समाज और वो लोग बहुत ही अस्वाभाविक और उच्चकोटि के बुध्दिजीवी कहलायेंगे जो की इस सामजिक विद्वेष के कारक को जड़ से समाप्त कर पाने में सक्षम होंगे | तब तक के लिए एक सवाल सोचने के लिए छोड़े जा रही हूँ की आखिर भेदभाव की यह भावना लिए कब तक समाज इन्ही खोखले विचारो पर खड़ा रह पायेगा...!!

Wednesday, February 23, 2011

एक पुरानी बात


एक सुबह आँख खुलते ही रोज़ की तरह हाँथ टेबल पर रखे अखबार की तरफ बढ़ गया | हमेशा की तरह आज का भी अखबार क्रिकेट वर्ल्ड कप फीवेर से रंग हुआ था ,चूकि वर्ल्ड कप का मौसम आ गया है तो अब रोज़ का यही माहोल हर तरफ छाया ही रहेगा |देश दुनिया की खबर पढ़ते और अखबार उलटते पलटते अचानक नज़र दो कालम के एक खबर पर पड़ी जो कि देश के नागरिक उड्डयन को सौ वर्ष पुरे करने कि थी ,जिसमे नागरिक उड्डयन में गाथा लिखने वाले महत्वपूर्ण लोगो को सम्मानित किया गया था |समारोह में नागरिक उड्डयन मंत्री व्यालार रवि महोदय ने १९८६ में आतंकियों कि गोली का शिकार हुए अपह्रत पेन एम् विमान कि ऐरहोस्तेस नीरजा भनोट ,भारत में नागरिक उड्डयन के भीष्म पितामह जे आर डी टाटा ,१९३० में मात्र १७ वर्ष कि उम्र में लन्दन से दिल्ली तक उड़ान भरने वाले पायलट ,एसपी इंजिनियर ,देश कि पहली महिला पायलट सरला शर्मा,लक्ष्मीपत सिंहानिया समेत कई दिग्गजों को याद कर पुरस्कार दिया गया |पर इन्ही सब के बीच आतंकवाद की खौफनाक दास्ताँ के साक्षी "कांधार अपहरण काण्ड " के बहादुर पायलट और केबिन क्रू को भुला दिया गया |और उड्डयन सचिव डॉ. नसीम जैदी ने तो ये कहकर अपना पल्ला झाड लिया की जो लोग इस समारोह में शामिल नहीं हो पाए ,उन्हें आगे सम्मानित किया जायेगा |उस वक़्त खबर को पढ़ने के baad अखबार रख के और काम करने लगी पर दिमाग का एक कोना उस कांधार हाइजैक केस की यादो की उधेड़ बुन पिरोने लगा था | हलकी हलकी धुंदली यादो को फिर से एक एक करके कतार में लगाने लगी ,मैं शायद उस वक़्त तेरह चौदह साल की ही थी जब की ये घटना थी और बस इतना याद है की पापा घंटो टी वी पर समाचार निहारते और मनः चिंतन करते बिता रहे थे , उस दिन इंडियन ऐयर लाइन विमान संख्या ८१४ (वी टी - ई डी डब्ल्यू ) में १७८ यात्री सवार थे जिनमें से ज्यादातर भारतीय नागरिक थे जो नेपाल में छुट्टी बिताने के बाद भारत वापस आ रहे थे. शुक्रवार, २४ दिसंबर १९९९ को क्रिसमस की पूर्व संध्या पर भारतीय समय के अनुसार लगभग ०५:३० बजे विमान के भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश के कुछ ही समय बाद अपह्रत कर लिया गया था | अपहरण का यह सिलसिला सात दिनों तक चला और भारत द्वारा तीन इस्लामी आतंकवादियों - मुश्ताक अहमद जरगर , अहमद उमर सईद शेख (जिसे बाद में डैनियल पर्ल की हत्या के लिए गिरफ्तार कर लिया गया ) और मौलाना मसूद अजहर (जिसने बाद में जैश ए मुहम्मद की स्थापना की) को रिहा करने के बाद समाप्त हुआ |और फिर अचानक से एक नाम उस घटना से सम्बंधित दिमाग में कौंध गया,और सहसा ही उठकर मेरी उंगलिया कंप्यूटर पर 'रचना कात्याल ' नाम की सखशियत को ढूँढने लगी | काफी देर ढूँढने के पश्चात् उक्त विषय पर बहुत ज्यादा जानकारी इकट्टा नहीं कर पाई | रचना कात्याल को ढून्ढने और पता लगाने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था की मन में जिज्ञासा थी की जानू आज की तारीख में उनकी कोई खबर मिल जाये और पता पड जाये की इस घटना के इतने वर्षो बाद वो कैसी है ,कहा है,कैसे अपना जीवन व्यतीत कर रही है | इन्टरनेट से मिली जानकारी के अनुसार उनके बारे में आखिरी लेख बारह जनवरी २००१ का मिला जिससे पता चला की उस वक़्त तक वो इंडियन एयर लाइन के हरयाणा हेडक्वार्टर में ऑफिस असिस्टेंट के रूप में कार्यारत थी |और अपने सास ससुर के साथ अपना बाकी जीवन बिता रही है | अपनी विवाहित जिंदगी जी पाई ये बीस दिन की दुल्हन अपनी आप बीती बताते हुवे कहती है " ८ दिन की कठिन सत्यापरीक्षा के दौरान ,मुझे ये बिलकुल अंदाजा नहीं था की मेरे पति को उन लोगो ने उस सात दिनों में से पहले ही दिन मार दिया था ,मैं चिरसून्य हो चुकी थी मुझे बस इतना याद है की मेरे डॉक्टर आये और उन्होंने मुझे गहरी नींद की दवाए लेने का सुझाव दिया ,मैंने अपने पति रिपन को अपहरण के पहले दिन से ही नहीं देखा था जब से अपहरण कर्ताओं ने कुछ पुरुषो को इकोनोमी क्लास से उठा कर क्लास वन में बैठा दिया था ,आज उस घटना को एक साल होने को आये है | आज मुझे इस बात का एहसास है की अपनों के दूर चले जाने के पश्चात भी जिंदगी ख़त्म नहीं होती चलती ही रहती है ,हम जो जिंदा है रिपन के माता पिता और मैं हमे ऐसे चलते रहना ही है " |वैसे तो इस घटना को आज तकरीबन दस साल से ज्यादा हो चुके है और हम में से ज्यादातर लोग इस घटना को कब का भूल चुके होंगे | खुस्किस्मती कह ले की इस दुर्घटना में रिपन कात्याल के अलावा और कोई जानहानि नहीं हुई ,पर न जाने कितनी ही रचना कात्याल आज भी अपनी सूनी मांग लिए दुनिया से हालातो से लड़ रही होंगी और न जाने कितनियो ने हालातो से मजबूर होकर घुटने टेक दिए होंगे,इस आसरे में कब कोई सरकारी मदद मिलेगी | प्रजातंत्र देश के नागरिक होने के पश्चात हम आज भी अपने हक के लिए लड़ नहीं पाते और झुक जाते है इसी सिस्टम के आगे जो हमारे द्वारा ही जीवंत हुआ हमने ही बनाया , हमने ही चलाया | वक़्त के साथ रचना कात्याल भले ही अपनी आप बीती भूल जाये या भले ही रिपन कात्याल की मौत को सांत्वना के नाम पर एक सड़क का नामकरण मिल जाये , परन्तु ऐसी ही हज़ारो घटनाओ ने एक सवाल जरुर मन में खड़ा कर दिया है की जब हम ये भली भाँती जानते और समझते है की हमे अपनी सहायता खुद ही करनी है तो हम क्यों और कब तक इस सिस्टम का रोना रोते रहेंगे और कब सीखेंगे की हमे उठाने कोई दूसरा नहीं आयेगा हमे खुद ही अपने कपडे झाड़कर और संभल कर आगे की मंजिल तय करनी है |इस तरह के हज़ारो क्रांतिकारी विचार मन में थोड़ी देर के लिए घुमते रहे और रात होने को आयी | परन्तु विचारों की ये गुत्थी जितनी जटिल थी उतनी ही हलकी भी, जिसे झाड कर मैं वापस चिर निद्रा को चली गयी ये सोचते हुए की "छोड़ो भी"...ये संसार है यार |

Tuesday, February 15, 2011

"माँ प्यारी माँ "

एक और दिन तुम्हारी मुस्कान के बिन
एक और दिन फिर गुज़र गया
आज जान पाई की तुम्हारी अहमियत
तुम्हारा मेरे साथ होना कितना ज़रूरी था
माँ मैंने चाहा की तुम्हारे लिए हर पल तुम्हारे साथ रह सकू
और हमेशा तुम्हरी आँखों को पढ़ सकू
चाहा की तुम्हारे साथ ही बिताऊ हर बसंत
चाहा की मरू भी तो तुम्हारी ही गोद में
वक़्त की करवट को मैं न रोक पाई मैं माँ
मीलो की दूरियों ने थाम दिया मेरा सफ़र
तुम मेरी ताक़त थी , तुम्हारा साथ भी मेरी मुस्कान का कारन था
तुम साथ थी तो सब कुछ अच्छा था
ऐसा बंधन था तुमसे ,ऐसा रिश्ता था तुमसे
तेरे हांथो की थपकी ही मेरी सारी थकन उतार देती थी
आज तू चुप रहती है ,मुझसे शिकायत भी नहीं करती माँ
मेरी गलतियों प्र न डांटती है और न ही प्यार से
माथा चूमती अब तू मेरा , न गोद पर बिठाती
साथ गुज़ारे वक़्त ने हमारे रिश्ते को और मज़बूत किया था
मेरा दिल थम सा गया ,अब नहीं दुखता
दुःख देता है आज तेरा अनजान बन जाना
सोचती हु की क्या मैं ही न समझ सकी तुम्हे
पर क्या यह वजह काफी थी मुझे खुद से दूर करने के लिए ||

I dont want to blog when i have extreme feelings,like when i am super happy or super unhappy. but sometimes my blog becomes the place where i can let out what i feel…. technically i am not even letting it out.i am just trying to push it all away and forget but it never works. my last post was very simple but this one… is the exact opposite…..

life , though it has many many upsides and downfalls. but is the same, the higher you get,the harder you fall.i thought i had it all friend, family, life. but its all a facade. i have just been seeing the happy things… but in reality life isnt that perfect.

i dont really want to tell whats wrong but if you do know, then its a sign that you know im not always the happiest person on earth, i think im being selfish but i think that if i tell people they’ll be there to support me but how can i repay them, my gratitude doenst seem enough. its so complex. all these feelings that are whirling inside me all time its killing me slowly from the inside. the episodes of quietness and silence grow longer when im with people they worry about me and try to see if they can help. i genuinely thank them for their concern but sometimes. i dont want to take there happiness and exchange it for my sadness. this feeling is so hard to understand.. its so hard for me to comphrehend, i want to run away i thought i could . but it’s coming for me and. it’ll come back worse than before. my friend dont let me slip from the reality,the reality that im trying so hard to run away from,keep me sane so i can come down to earth and be me.

Monday, January 31, 2011

"Tassalli thi ek din k mera koyi maksad nahi,
aaj har insaan muje ek maksad se daudta hi mila"

"main chup rahi ye sochkar ki bikhre na apne,
yaha har apna mujh per chillane hi laga"

"har ungli jab uthne lagi mujh pe,
to laga yu ki samajhdar ho gaye"

"tamaashbeen bankar jab khadi thi bheed me main bhi'
usi pal ek purana ghaav sa dukh gaya"

"numayish na chahi thi apne basar ki is tarh,
par toofan ne chhat hi ujaad di mere ghar ki"

"bahot nazuk hote hai ye aaine sambhaal kar pakdo inhe,
sach bolne wale aksar kamzor bhi hua karte hai"

"nahi mushkil kisi per sab kuch kurbaan karna,
per hai mushkil jo teri kurbani samjhe wo insaan bhi mile"

"raaz bhi bikte hai aur baat bhi bikti hai yaha,
achche daam laga lo to khuda bhi le jao"

"sapno ke aakash me udti hi rahi,
sachchayiyon ne takra ker giraya tha mujhe"

"aankh moond li jab dekhi duniya ki asaliyat,
per duniya bhi to mujh se do-char ne hi basayi"