“गलतियां सशक्त और कमज़ोर दोनों ही तरह के लोग करते है ,परन्तु फर्क सिर्फ इतना है कि सशक्त वही कहलाता है जो गलतियाँ मानता है और कमज़ोर वो जो बहाने मारते है”
हमारा इतिहास शक्तिशाली राज्यों और देशो द्वारा छोटे राज्यों और उनकी भीतरी सत्ता पर अधिकार ज़माने का चलन और किस्सों पटा पडा है | सफ़ेद यूरोपियनो विशेष रूप से स्पेनिश और अमेरिका ने बहुत सी सभ्यताओ जैसे ‘माया’, ‘इनका’ और ‘एज़्टेक’ तक को खात्मे की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया | नोबल पुरुष्कार विजेता “डेसमंड टूटू’ ने कहा “जब सफ़ेद यहाँ आया था ,तो बुक (बाईबिल) था और अब देश है”| दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद नीति के खिलाफ शुरू हुए क़ानून “सत्य और पुन:पर्रामर्श आयोग” के गठन के पश्चात वहां श्वेतों के उत्पीडन से अश्वेतों के मौलिक अधिकारों के हनन और इसके बचाव पर पहली बार ध्यान दिया गया | नेल्सन मंडेला द्वारा चलाये गए टी. आर. सी. की सफलता ने दोनों ही उत्पीडक और उत्पीडित दोनों की ही स्थितियों को नैतिक रूप से सशक्त किया | जहा एक तरफ काले पीडितो को नफरत और प्रतिशोध से छुटकारा मिल गया वही दूसरी ओर सफ़ेद अपराधियों को उनके अपराध का बोध कराया |
हाल ही में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने टी.आर. सी. के गठन सम्बंधित सुझाव देते हुए कहा “लोगो को पता होना चाहिए की कैसे राज्य में उग्रवाद शुरू हुआ? बन्दूक संस्कृति कहा से आई ?हिरासत में हत्याओं ने जगह कैसे ली? सैकडो राजनीतिक कार्यकताओ को मार डाला गया ? कश्मीरी पंडितो के पलायन और यातना दिया जाना सही है या गलत ?” मामला सिर्फ कश्मीर का है तो वह कि परिस्थितियों को देखते हुए वहां इस क़ानून का गठन अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है ,उनके द्वारा दिया गया सुझाव काफी सराहनीय भी था |
न्याय की मांग के मुद्दे पर आज भी समाज में आज भी हर बार एक पक्ष दूसरे की खिलाफत में खड़ा रहता है | स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से लेकर अब तक भारत इसी दोराहे पर खड़ा रहा है | माओवाद, आरक्षण आन्दोलन, हजारो राजनीतिक हेर फेर ,सामाजिक उठा-पटक, अंतर्राष्ट्रीय तालमेल और ना जाने ऐसे ही कितनी समस्याओ से हमारा देश आज बहुत सी अनैतिक परिस्तिथियों में झूल रहा है ,ऐसे में सिर्फ सूचना का अधिकार क़ानून बना देना और कमज़ोर प्रचार सिर्फ अपना पल्ला मात्र झाड लेने जैसा कार्य करना हमारी समस्या का कोई उपाय नहीं दे सकेगा |ऐसे हालातो में जागरूकता आम इंसान तक पहुचना बड़ी बात नहीं ,अंजाम तक पहुचना बड़ी बात है| अतीत से दबे हुवे संघर्ष और बहस को फिर से खोलने और सुलझाने का प्रयास कभी कभी समाधान पाने के बजाय आतंरिक अशांति , गृह युद्ध ,तानाशाही ,आतंकवाद ,मानव अधिकारों का हनन आदि को जनम भी दे देती है | इन खामियों के बावजूद समय चक्र आज भी बदस्तूर वैसा ही चलता चला आ रहा है | ऐसे हालातो में टी. आर. सी. का गठन एक स्थायी समाधान साबित हो सकता है, हम भारतीयों को सामंजस्य, धर्मनिरपेक्षता में बांधकर अनिश्चितता कि सोच से उबारने का | लेकिन ऐसा लगता है कि सुलह का ये विचार अभी तक राजनीतिकरण और मन कि कल्पना मात्र बन चुका है ,यहाँ हर कोई अपना उल्लू सीधा करना चाहता है और इसी होड़ में एक दूसरे के गिरहबान पर ऊँगली उठाने पर भी नहीं हिचकता ‘आम इंसान’ | सुचारू रूप से मानव सभ्यता को विकास के क्रम से मिलाने कि जुगत में शायद यही रास्ता कोई मंजिल दे जाये हमे ,क्युकी गलतियाँ करना तो इंसान की फितरत है पर उन्ही गलतियों को सुधारकर उनसे सीख लेते हुए आगे को बढ़ना मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों को क्षितिज पार ले जाने का नियम |













