Sunday, March 27, 2011

“तहज़ीब–ए-सफरनामा”

aasfi mosque -bada imaambada 
लखनऊ हम पर फिदा और हम फिदा ए लखनऊ,
क्या है ताक़त आसमां की ,हमसे छुड़ाए लखनऊ

ये खूबसूरत जज़्बात सिर्फ भावो को अपने शब्दों में बयाँ करने का तरीका ही नहीं बल्कि बताती है उस खूबसूरत शहर की दास्ताँ जो वक्त और और बदलाव की बयार में आज भी अपनी संस्कृति और तहज़ीब को संजोकर आगे बढ़ रहा है | यूँ तो लखनऊ से मेरा कोई ज़मीनी ताल्लुक नहीं था पर इन ४ सालो के लखनऊ के सफर ने इतना प्रभावित कर दिया की ये देश पराया होते हुए भी अपने से बढ़कर लगता है| सुनने में तो बहाने सा लगेगा की इस शहर में रहते ४ साल होने को आये पर असल लखनऊ
देखने का मौका कभी नहीं मिला ,पर लखनऊ किसी एक निश्चित जगह – मीनार ,गुम्बद से नहीं जाना जाता , लखनऊ को ‘लखनऊ’ बनाने के पीछे न जाने कितने ही कारण है : यहाँ की नजाकत-नाफाज़त ,तहज़ीब ,शायराना मिजाज़ ,यहाँ की शाम, कन्कव्वेबाज़ी ,चिकनकारी-ज़रदोज़ी ,रेवड़ी , दशहरी आम ,गलौटी कबाब-शीरमाल, कला-नृत्य, गंगा-जामुनी संस्कृति और सबसे महत्वपूर्ण यहाँ के खुशमिजाज़ लोग : ये सब मिलकर इस शहर को बाकी शहरो से बिलकुल जुदा बनाते है |नवाबो की परंपरागत पहचान को जिंदा रखने वाले इस शहर ने पूरी दुनिया में अपनी अलग मिसाल बना कर रखी है ,पूरे हिन्दुस्तान में आज भी अगर नरमदिल लोग और तहज़ीब की बोली कही सुनने को मिलेगी तो वो सिर्फ लखनऊ ही होगा ,अवधी खड़ी बोली की रीत निभाने वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ लखनऊ ही ऐसा शहर है जहा आज भी तहज़ीब और मीठी जुबां वाले लोग बहुताय मिलेंगे | पर वक्त की इसी आपाधापी में धीरे धीरे ये शहर अपनी पहचान भुलाने सा लगा था और इसी तर्ज़ पर लखनऊ नगर निगम और उत्तर प्रदेश टूरिस्म ने एक सम्मिलित प्रयास चालू किया अपनी इसी संस्कृति को बचाने का और इसी प्रयास के अंतर्गत “लखनऊ:हेरिटेज वाल्क” की सुरुवात की ,जिसे अपनी जुबान में आपसे बताने जा रही हूँ |


aasfee mosque
इतवार की सुबह निकल पडा हम १८-२० लोगो का काफिला पुराने लखनऊ की सैर को ,सुबह पूरी ताकत और स्फूर्ती से लबरेज हम मित्रजन निकल पड़े इस शहर की कुछ मीठी यादो को इकठ्ठा करने जिसमे सहायता की हमारे गाइड नावेद जिया साहब ने और शुरु हुआ हमारा सफर पुरानी टीले वाली मस्जिद से | लफ्जों को रबड़ी की तरह जल्दी जल्दी चाट कर बोलने वाले जिया साहब बड़े ही दिल्चस्प इंसान थे और ऐसे में उनका बात् चीत के आदान प्रदान का तरीके के कायल हम लोगो को टीले वाली मस्जिद दिखाने से हुई लखनऊ भ्रमण की शुरुआत | हज़रत शाहपीर की याद में निर्मित टीले वाली मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने कारवाया जिस कारण इसे आलमगीर मस्जिद के नाम से भी जानते है | वहां का वर्णन करते हुए जिया साहब कहते की टीले वाली मस्जिद लखनऊ के सबसे ऊंचे बने भवनों में से एक है | अदर क्वेश्चन ?? ऐनिबडी?? पूछते हुए जिया जी आगे को बढते है, वहां से निकल कर हम चले बड़े इमामबाडा की ओर वहा गेट पर खड़े होकर उन्होंने अपनी स्वनिर्मित अंग्रेजी भाषा में बताया “व्हेन एवर एनी डेंजर इस कमिंग एनी एनेंमी इस कमिंग देन एवर गार्ड इस वाचिंग फ्राम हिस् विव देन ही विल वेव हिस् फलेग टू शो डी मैंन वाचिंग फ्राम इनसाइड ,बट वि आर नाट एबल तो वाच हिम फ्राम हियर” ,व्हेन एवर को पूरा करते उनके देन एवर के शब्द बहुत ही मनोरंजक लगते थे |पर उनके भाव बहुत ही साफ़ थे जिसका मतलब बस इतना था की उस समय का सुरक्षा प्रणाली भी काफी सुदृण हुआ करती थी | इमामबाडा सिर्फ एक धार्मिक भवन था जो की ईराक के ग्यारहवे इमाम हुसैन के मकबरे की हमशक्ल है |यही दूसरी ओर आशि मस्जिद भी है जो की नवाबो की कौमी एकता भावना को भी दर्शाता है क्यों कि इसके दोनों गुम्बद में से एक गुम्बद में हिंदु मान्यता के अनुसार लक्ष्मणपुरी माने जाने वाले लखनऊ में लक्ष्मण का प्रतीक शेषनाग के फन भी बने हुए है और यहाँ की एक और खासियत है की यहाँ के ज़्यादातर भवनों में जगह जगह मछली के जोड़े भी बने हुए है | इंडो-इरानियन बनावट से मिलकर बनाये गए ये भवन नवाबो कि कौमी एकता कि मुहीम को बयाँ करने का तरीका भी था |
nawaabs of lucknow 
         इमामबाड़ा की एक और खासियत बताते हुए हमारे गाइड हमे बताते है की ये पूरा निर्माण लक्खोरी ईट और गारे से बनी हुई है जिसमे चूना पाउडर ,शहद ,मास्(मसूर) की दाल ,दही और सिंघाड़े के आटे को मिलाकर सारी बनावट और नक्काशी की गयी है , सुनने में बड़ा अजूबा लगा की एक इमारत २०० साल से भी ज्यादा के वक्त से इन सब सामानों के मिश्रण पर उसी तरह आज भी खड़ी है और आज के दौर के हमारे सीमेंट और मौरंग के ठोस घोल आज १० साल भी हमारे घरों को ठीक से टिका नहीं पाते | इमाम बाडे की सैर करने के बाद हमारे गाइड जिया साहब हमे ले गए लखनऊ की मशहूर पहलवान ठंडाई वाले की दूकान पर ताज़ी ताज़ी ठंडाई का हमे लुत्फ़ उठवाने के लिए ,ठंडाई वैसे तो हिन्दुस्तान में भगवान भोलेनाथ के प्रसाद के रूप में जानी जाती है और इसमें भांग (अंग्रेजी में ‘मैरिजुआना’ के नाम से जाना जाने वाला मादक पदार्थ) मिलाकर पीना लोग अपने शौक में भी शामिल करते है | ऐसे ही एक शौक़ीन देखने को मिले हमे एक जनाब जिनकी उम्र लगभग ९० वर्ष के आस पास की थी और वो हर रोज नियमानुसार उस दूकान पर भांग का सेवन करने आते है बिना किसी छुट्टी ,और दूकान के मालिक गुड्डू जी ने ये भी बताया की वहां लगभग हमेशा ऐसे शौक़ीन प्रवृत्ति लोग दूर दूर से आते है |
वहा से निकलकर जिया साहब को अलविदा कह हम उनके दो और सहयोगी गाइडो के साथ चल पड़े पुराना लखनऊ (चौक) की सैर को नयी फूल मंडी को पार करते हुए हम पहुचे लखनऊ की उन तंग गलियों में जो आज भी पुराने लखनऊ के नाम से जाना जाता है और साक्षी रहा है हमारे इतिहास का , हमारे नए गाइड आसिफ साहब बताते है की शायरों के शहर के नाम से भी जाना जाने वाले लखनऊ के किसी शायर ने फ़रमाया है :

“मर्द वो है जो मरदाना वार लड़ के मरे ,
मरे ज़रूर मगर मौत से लड़ कर मरे,
saleman from phool mandi 
न इक्के ताँगे-न बस से लड़ कर मरे ,
तेरी याद में एडी रगड-रगड के मरे
इसका तात्पर्य सिर्फ इतना था की जितने भी शायर बने सारे अपनी प्रेमिकाओ अथवा बीवियो की बेरुखी से आजिज़ आकर शायरी की राह चल पड़े थे ,वैसे मेरी अपनी सोच में तो ज्यादातर शायर किसी न किसी की बेवफाई या याद में तरस कर ही शायर बनते थे | खैर इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हम पहुच गए झरोखा बाजार यानी की वो बाज़ार जो की मशहूर था नर्तकियो के नृत्य-गायन के लिए,जहा दूर दूर से लोग आते थे गीत संगीत और नृत्य का आनंद लेने ,उस ज़माने में लोग यहाँ तहज़ीब-ओ-आदाब का तरीका मतलब उठने-बैठने ,खाने-पीने और रहन-सहन का तरीका सीखने जाया करते थे | पर आग और पानी ज्यादा दिन एक साथ रह नहीं सकते इसलिए यहाँ आने वाले मर्दों ने इस मोहल्ले को कला के बाजार से जिस्मफरोशी का बाजार बना दिया और बन के रह गया एक बदनाम मोहल्ला |

kalli ram temple 
            आसिफ जी जुबां सुनने में पूर्ण रूप से तहज़ीब परक थी ,उनके नपे तुले से लफ्ज़ और सलीके की आवाज़ उनकी अभिव्यक्ति को और स्वच्छ बना रही थी | आगे बढते हुए उन्होंने बताया की पुराने लखनऊ का पूरा बनावट ‘टाउन प्लानिंग सिस्टम’ पर आधारित थी जो की अनेको टोलों में बाटी गयी थी और हर टोले में तकरीबन सैकडो भवन आते थे और इनमें मौजूद हवेलियों और भवनों के द्वार छोटे और अन्दरूमी बनावट भव्य थी | घरों के मुख्य द्वार को देखकर अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था की अंदर इतनी शानदार इमारत भी हो सकती है | आगे बढते हुए हम पहुचे कल्ली राम के मंदिर जहा आज एक राम मंदिर बना हुआ है और बताया जाता है की इसी प्रांगण में मौजूद कुवे से आज से तकरीबन २०० साल पहले भगवान राम की काली रंग की मूर्ति प्राप्त हुयी थी जिसे की वहां के वंशज सिर्फ राम नवमी के दिन सबको दर्शन करवाने के लिए ही निकालते है | एक और दिलचस्प बात थी यहाँ की मूर्तियों की ,वो ये की वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध सीता जी की मूर्ती राम और लक्ष्मण के बीच स्तिथ है ,हालाकि मुझे ये तथ्य समझ नहीं आया की कुवे में तराशी हुई मूर्ति मिली ,दूसरी अगर काले रंग की थी तो काले तो कृष्ण भगवान भी थे तो उनकी क्यों नहीं और तीसरी अगर सीता जी की मूर्ती मध्य में थी (जो की दर्शाती थी सीता और लक्ष्मण के रिश्ते को) तो वो मूर्ति भगवान कृष्ण–सुभद्रा-बलराम की भी तो हो सकती थी और मेरी नज़र में तथ्यपूर्ण बात नहीं लगती,खैर इस विषय की बहस यही खत्म करते है |


begum nusrat fatima 
hukumnama of aurangzeb 
यूनानी सफाखाना और और उस समय की फ्रेंच मार्केट भी इसी मोहल्ले में मौजूद है जहा घोडो और नील का कारोबार हुआ करता था | फ्रेंच मार्केट एक कुवे के इर्द गिर्द बनी थी जहा आज उसी कुवे को पाटकर कपडे की दूकान बन चुकी है |फ्रेंच मार्केट के पीछे ही मौजूद फिरंगी महल जो की हमारी स्वाधीनता आन्दोलन का महत्वपूर्ण कालपिन्डो को अपने में छुपाये आज भी खड़ा है ,यहाँ की मौजूदा मालकिन बेगम नुसरत फातिमा जो की मुगलो की बारहवी पुश्त है उनसे मुलाक़ात करने का भी मौका मिला | इसी फिरंगी महल की एक दीवार पर अकबर और औरंगजेब का हुकुमनामा भी टंगा है जो ये बताता है की इस ज़मीन की मालिकाना हक़दार उनके पूर्वज और वे लोग रहेंगे , ‘बेगम फातिमा’ का दरियादिल और मिलनसार स्वभाव दिल को छू सा गया अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती है की “तब मैं क्लास ४ में थी जब इसी फिरंगी महल में मोतीलाल नेहरु ,सरोजिनी नाइडू , लाला लाजपत राय और भी कई स्वतन्त्रता सेनानियों ने ‘खिलाफत आन्दोलत’ की मीटिंग इस कमरे के नीचे मौजूद तैखाने (ऊँगली से एक कमरे की ओर इशारा करते हुए ) की थी | बहुत ही तराशी हुयी उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए वो अपने पुराने दिनों को याद करते हुए खुशी खुशी अपनी पूर्वजो की बाते बताती जा रही थी ,उनकी बातो में इतना खो गए हम सब की भूल ही गए की हमे वापस भी जाना है | वहा से निकलकर हम तंग और सकरी गलियों को पार करते जा रहे थे और वह मौजूद पुराने भवनों की नक्काशी और कारीगरी की बारीकी इतनी सुन्दर थी की बस नज़र ही नहीं हट रही थी |


लखनऊ इन सभी खूबियों के साथ साथ अपने खान पान और विशिष्ट शैली के लज़ीज़ व्यंजन के लिए भी दुनिया में मशहूर रहा है ,यहाँ मिलने वाला कबाब की भी अलग अलग तरह की किसमे जैसे गलावटी-कबाब, शामी-कबाब, बोटी-कबाब , पतीली के कबाब , घुटवा-कबाब , सीक-कबाब अपनी पहचान दुनिया भर की रसोईयो में बनाते है | महाराज हाजी मुराद अली के नाम की ‘मलाई की गिलोरी’ और 'काकोरी कबाब', खान प्रेमियों के बीच खासा लोकप्रिय हैं | बिरयानी ,मुगलई पराठा ,फिरनी ,मख्खन मलाई आदि व्यंजन लखनऊ शहर वासियों की ही नहीं बल्कि हर खाने के शौक़ीन के दिल में बसता है| अब जब लखनऊ के खाने की इतनी तारीफ सुन ही रखी थी और यहाँ के स्वाद से जुबान अच्छे से वाकिफ थी तो इतना घूमने फिरने के बाद हमारे पेट में चूहों का कूदना स्वाभाविक था और हम जा पहुचे चौक के मशहूर “टुंडे कबाबी” की दूकान और वह के गलावटी कबाब और शीरमाल का भरपूर आनंद लिया | समय के बदलते स्वरुप और वक्त की मांग ने भले ही आज के इंसान को फास्ट फ़ूड और इंस्टेंट मिक्स का लती बना दिया हो बस इस भाग दौड की दुनिया में लखनऊ की नवाबी खाने की महक आज भी वैसी ही है,और भीड़ पहले से भी ज्यादा |
tunday kabaabi

पेट पूजा के बाद हम वापस पहुचे इन्ही गलियों को देखने : चिकनकारी और ज़र्दोजी के काम के लिए मशहूर लखनऊ की पुरानी चौक मंडी और अपने काम में तत्परता से लगे यहाँ के क्म्प्युट्राइज्ड कारीगर,चांदी को पीटकर वर्क बनाते कारीगर ,नमाजी और लखनवी गलावटी कबाब-बिरयानी की दूकान से आती लज़ीज़ पकवानों की महक पूरे माहोल को और यादगार बना रही थी |और बस यही वक्त था अपने गाइड जनाब आसिफ और नवाबी नाफाज़त के माहोल से अलविदा लेने का और वापस लौट कर आने का इन्ही कुछ यादो को ज़हन में समेटकर |

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