Monday, March 21, 2011
भारत बनाम इण्डिया
'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहा है' इन्कलाब देश भक्ति के गीत संगीत और संवाद को बया करते ये बोल आज के दौर में सतही प्रभाव जताते होंगे , वाद विवाद के दृष्टिकोंड से ये बाते भले ही मजबूत तर्क वितर्क कमा ले | पर सच तो यही है की आज हमे हमारी देशभक्ति याद दिलाने और उसे महसूस करने के लिए मल्टीप्लेक्सों में सिनेमा शुरू होने के पांच मिनट पहले राष्ट्रीय गान बजने पर उसके आदर और सम्मान में मजबूरन शर्मशुदा होकर खड़ा होना पड़ता है |समाज सिनेमा और साहित्य ये आपस में समानांतर रूप से एक दुसरे के पूरक और अच्छा साहित्य सिनेमा के लिए मददगार साबित होता है पर आज के सिनेमा से साहित्य की पकड़ धीरे धीरे छूटती जा रही है | आज के दौर की सिनेमा जहा अपने वास्तविक रूप से बिलकुल अलग हट कर नए समाज को दर्शाती है वही दर्शको की नयी पीढ़ी की सोच को भी वर्णित करती है|
खेत खलिहान और हाट बाज़ार के इर्द गिर्द घूमती पुराने दौर की फिल्मे जहा असल भारत की पहचान हुआ करती थी वही आज उनकी जगह है हाई टेक माल और बड़े बड़े शहरो ने ले ली है | मध्यम वर्ग बहुल आबादी वाले देश ने संयुक्त परिवारों को नयूक्लियर परिवारों में तब्दील ही नहीं किया बल्कि आम आदमी की सोच पर ऐसा असर डाला की वो अपने ही परिद्रश्य से मुह छुपाने लगे है | मशहूर अभिनेत्री दीप्ति नवल कहती है "अच्छा साहित्य अच्छा सिनेमा तैयार करता है' |ज़मीनी सच्चाई से दूर आज का दौर साहित्य से खुद को पहले की भाति जोड़ नहीं पता ये बदलाव आखिरकार कितना कारगर साबित होगा ये बता पाना आज तो संभव नहीं | अभिनेता अब गाँव से निकल कर कनाडा-अमेरिका के फ़ार्म हॉउस में करोडो का बिसनेस करता दीखता है ,हीरोइने अब घागरा चोली से निकल कर जींस टॉप और शोर्ट्स में ज्यादा आरामदेह अनुभव महसूस करती है जो की वास्तविक हिन्दुस्तानी परिवेश से कोई लेना देना नहीं रखती ,आज का भारतीय आज भी खुले खेतो के ओट में चारपाई पर लेटे आसमान ताकते और तारे गिनते गुजारता है ,औसतन भारतीय हर शाम देसी दारु के अड्डे में पौवा पीते गुज़ार रहा है उसका पब डिस्को में जा कर देर रात बैठना तो दूर की बात वहा जाने और वहा के खर्चे के बारे में सोचता तक नहीं | आज के मल्टीप्लेक्सों में औसतन फिल्म देखने का खर्चा १५० से लेकर २५० के बीच होता है जो की हमे धड़ल्ले से खर्च करने में ज़रा भी नहीं हिचकाती और वही दूसरी ओर हम रिक्शेवाले को दो रुपया बढ़ा कर मांग लिए इसलिए घंटो उनसे लड़ डालते है| हम युवा जन आखिर ऐसी संस्कृति के प्रति इतने आकर्षित क्यों भला..!! इस देश ने बदलाव का खुले दिल से स्वागत तो किया पर उस बदलाव को अपने मूल्यों और सोच में न बिठा पाया , हम आज भी बड़े बड़े मूल्यों और उसूलो की धमक दिखाने वाले रूढ़िवादी समझ वाले मानुष ही है |लीक से हटकर बनने वाली समानांतर सिनेमा भारतीय परिवेश की ज़मीनी सच्चाई से अवगत तो कराती है पर सिर्फ कुछ खास दर्शक वर्ग ही जूटा पाती है इसका एक बड़ा कारण हमारी खुद की रूढ़िवादी समझ ही कही जा सकती है ,उदारीकरण से वैश्वीकरण के ओर बढ़ते इस देश ने पश्चिमी सभ्यता में ऐसा क्या आराम पाया की अपनी जड़ो को काटने में तनिक भी देर नहीं लगायी बीते दो दशको में आये छोटे और बड़े पर्दों की दुनिया ने हमारे सोच और मूल्यों को इतना प्रभावित किया की हम सच में मदर इण्डिया की मेहनतकश और जुझारू पीढी से सास बहु सीरीअल की आरामपसंद और दिखावावाद के परिवेश को ओढ़ के अपनी वास्तविकता को छुपाने लगे है | जिस देश में आज भी बड़ा भारी तबका सिर्फ गावो में बसर करता है और चौबीस में से अट्ठारह घंटे बिना बिजली के रहता है और हर सौ में से अस्सी भारतीय गाँव से जुड़ा होने के बावजूद अपने असल जुड़ाव से अलग होना चाहता है|
बदलाव तो समय की नियति है इंसान बदलता है तो समाज भी बदलता है बदलाव के इस दौर में हम अपने आप को सर से लेकर पाँव तक लेकर अलग रंग में रंगा पाते है पर ज़रूरी ये है की इन सब के बीच बदलाव की बयार में हम खुद को कितना स्थिर रख पाते है और संतुलन बना पाते है | 'देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान् कितना बदल गया इंसान' ये गाना तो किसी संगीतकार ने बरसो पहले गाया था पर ज़मीनी सच्चाई को दर्शाते ये बोल सच में कितने सार्थक है इसे हम आज महसूस कर रहे है|
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बहुत ही शानदार लेख बधाई
ReplyDeletebadhiya likha hai mam aapne...
ReplyDeletemere blog par bhi aaiye..aur apni raai dijiye....
its jst.... wow
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