Wednesday, February 23, 2011

एक पुरानी बात


एक सुबह आँख खुलते ही रोज़ की तरह हाँथ टेबल पर रखे अखबार की तरफ बढ़ गया | हमेशा की तरह आज का भी अखबार क्रिकेट वर्ल्ड कप फीवेर से रंग हुआ था ,चूकि वर्ल्ड कप का मौसम आ गया है तो अब रोज़ का यही माहोल हर तरफ छाया ही रहेगा |देश दुनिया की खबर पढ़ते और अखबार उलटते पलटते अचानक नज़र दो कालम के एक खबर पर पड़ी जो कि देश के नागरिक उड्डयन को सौ वर्ष पुरे करने कि थी ,जिसमे नागरिक उड्डयन में गाथा लिखने वाले महत्वपूर्ण लोगो को सम्मानित किया गया था |समारोह में नागरिक उड्डयन मंत्री व्यालार रवि महोदय ने १९८६ में आतंकियों कि गोली का शिकार हुए अपह्रत पेन एम् विमान कि ऐरहोस्तेस नीरजा भनोट ,भारत में नागरिक उड्डयन के भीष्म पितामह जे आर डी टाटा ,१९३० में मात्र १७ वर्ष कि उम्र में लन्दन से दिल्ली तक उड़ान भरने वाले पायलट ,एसपी इंजिनियर ,देश कि पहली महिला पायलट सरला शर्मा,लक्ष्मीपत सिंहानिया समेत कई दिग्गजों को याद कर पुरस्कार दिया गया |पर इन्ही सब के बीच आतंकवाद की खौफनाक दास्ताँ के साक्षी "कांधार अपहरण काण्ड " के बहादुर पायलट और केबिन क्रू को भुला दिया गया |और उड्डयन सचिव डॉ. नसीम जैदी ने तो ये कहकर अपना पल्ला झाड लिया की जो लोग इस समारोह में शामिल नहीं हो पाए ,उन्हें आगे सम्मानित किया जायेगा |उस वक़्त खबर को पढ़ने के baad अखबार रख के और काम करने लगी पर दिमाग का एक कोना उस कांधार हाइजैक केस की यादो की उधेड़ बुन पिरोने लगा था | हलकी हलकी धुंदली यादो को फिर से एक एक करके कतार में लगाने लगी ,मैं शायद उस वक़्त तेरह चौदह साल की ही थी जब की ये घटना थी और बस इतना याद है की पापा घंटो टी वी पर समाचार निहारते और मनः चिंतन करते बिता रहे थे , उस दिन इंडियन ऐयर लाइन विमान संख्या ८१४ (वी टी - ई डी डब्ल्यू ) में १७८ यात्री सवार थे जिनमें से ज्यादातर भारतीय नागरिक थे जो नेपाल में छुट्टी बिताने के बाद भारत वापस आ रहे थे. शुक्रवार, २४ दिसंबर १९९९ को क्रिसमस की पूर्व संध्या पर भारतीय समय के अनुसार लगभग ०५:३० बजे विमान के भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश के कुछ ही समय बाद अपह्रत कर लिया गया था | अपहरण का यह सिलसिला सात दिनों तक चला और भारत द्वारा तीन इस्लामी आतंकवादियों - मुश्ताक अहमद जरगर , अहमद उमर सईद शेख (जिसे बाद में डैनियल पर्ल की हत्या के लिए गिरफ्तार कर लिया गया ) और मौलाना मसूद अजहर (जिसने बाद में जैश ए मुहम्मद की स्थापना की) को रिहा करने के बाद समाप्त हुआ |और फिर अचानक से एक नाम उस घटना से सम्बंधित दिमाग में कौंध गया,और सहसा ही उठकर मेरी उंगलिया कंप्यूटर पर 'रचना कात्याल ' नाम की सखशियत को ढूँढने लगी | काफी देर ढूँढने के पश्चात् उक्त विषय पर बहुत ज्यादा जानकारी इकट्टा नहीं कर पाई | रचना कात्याल को ढून्ढने और पता लगाने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था की मन में जिज्ञासा थी की जानू आज की तारीख में उनकी कोई खबर मिल जाये और पता पड जाये की इस घटना के इतने वर्षो बाद वो कैसी है ,कहा है,कैसे अपना जीवन व्यतीत कर रही है | इन्टरनेट से मिली जानकारी के अनुसार उनके बारे में आखिरी लेख बारह जनवरी २००१ का मिला जिससे पता चला की उस वक़्त तक वो इंडियन एयर लाइन के हरयाणा हेडक्वार्टर में ऑफिस असिस्टेंट के रूप में कार्यारत थी |और अपने सास ससुर के साथ अपना बाकी जीवन बिता रही है | अपनी विवाहित जिंदगी जी पाई ये बीस दिन की दुल्हन अपनी आप बीती बताते हुवे कहती है " ८ दिन की कठिन सत्यापरीक्षा के दौरान ,मुझे ये बिलकुल अंदाजा नहीं था की मेरे पति को उन लोगो ने उस सात दिनों में से पहले ही दिन मार दिया था ,मैं चिरसून्य हो चुकी थी मुझे बस इतना याद है की मेरे डॉक्टर आये और उन्होंने मुझे गहरी नींद की दवाए लेने का सुझाव दिया ,मैंने अपने पति रिपन को अपहरण के पहले दिन से ही नहीं देखा था जब से अपहरण कर्ताओं ने कुछ पुरुषो को इकोनोमी क्लास से उठा कर क्लास वन में बैठा दिया था ,आज उस घटना को एक साल होने को आये है | आज मुझे इस बात का एहसास है की अपनों के दूर चले जाने के पश्चात भी जिंदगी ख़त्म नहीं होती चलती ही रहती है ,हम जो जिंदा है रिपन के माता पिता और मैं हमे ऐसे चलते रहना ही है " |वैसे तो इस घटना को आज तकरीबन दस साल से ज्यादा हो चुके है और हम में से ज्यादातर लोग इस घटना को कब का भूल चुके होंगे | खुस्किस्मती कह ले की इस दुर्घटना में रिपन कात्याल के अलावा और कोई जानहानि नहीं हुई ,पर न जाने कितनी ही रचना कात्याल आज भी अपनी सूनी मांग लिए दुनिया से हालातो से लड़ रही होंगी और न जाने कितनियो ने हालातो से मजबूर होकर घुटने टेक दिए होंगे,इस आसरे में कब कोई सरकारी मदद मिलेगी | प्रजातंत्र देश के नागरिक होने के पश्चात हम आज भी अपने हक के लिए लड़ नहीं पाते और झुक जाते है इसी सिस्टम के आगे जो हमारे द्वारा ही जीवंत हुआ हमने ही बनाया , हमने ही चलाया | वक़्त के साथ रचना कात्याल भले ही अपनी आप बीती भूल जाये या भले ही रिपन कात्याल की मौत को सांत्वना के नाम पर एक सड़क का नामकरण मिल जाये , परन्तु ऐसी ही हज़ारो घटनाओ ने एक सवाल जरुर मन में खड़ा कर दिया है की जब हम ये भली भाँती जानते और समझते है की हमे अपनी सहायता खुद ही करनी है तो हम क्यों और कब तक इस सिस्टम का रोना रोते रहेंगे और कब सीखेंगे की हमे उठाने कोई दूसरा नहीं आयेगा हमे खुद ही अपने कपडे झाड़कर और संभल कर आगे की मंजिल तय करनी है |इस तरह के हज़ारो क्रांतिकारी विचार मन में थोड़ी देर के लिए घुमते रहे और रात होने को आयी | परन्तु विचारों की ये गुत्थी जितनी जटिल थी उतनी ही हलकी भी, जिसे झाड कर मैं वापस चिर निद्रा को चली गयी ये सोचते हुए की "छोड़ो भी"...ये संसार है यार |

3 comments:

  1. नेहा नया विचार नयी सोच और एक नयी जिज्ञासा
    अच्छा प्रयास
    बधाई

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  2. thank.u sir...thnx k apne meri kuch galtiyo ko nazarandaaz karke baki article ko padha aur samjha...apke comments padh k khusi to milti hi hai...sath hi laalach badh jata hai...aur paane ka...!!

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  3. chaa gyi yaar...awesome..padh ke maza aa gya..!! :-)

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