Wednesday, October 3, 2012

"To STOP train pull chain"(गाडी रोकने के लिए ज़ंजीर खीचें )

रेल ...!! छुक छुक गाडी ..!! दौड़ती -हांफती ...जिंदगी की हमसफ़र... हमकदम... रोजाना आढती से लेकर करोडो आमदनी वाले की भरोसेमंद . नन न ना ...माफ़ कीजियेगा !!...गैर भरोसेमंद ...सहगामिनी ...लेकिन क्या करे ?? बेचारी अकेली जान !! असंख्य कमियों ,छेड़खानियों को सहने और कसीदों को सुनने के बाद भी किसी आम भारतीय गृह-वधू सी घूंघट में छुपकर अपने परिवारी जनो का भरण पोषण ताउम्र सर झुका कर करती रहती .
मेरे जैसे आम इंसान का भी ...जिसे हर रोज़ की भाग दौड़ के लिए इसके सहारे रहना पड़ता है .स्टेशन पहुचते ही ... आह!! ये कमी ...!! वो परेशानी ...!! भीड़ भक्कड़ ...!! इतनी साड़ी आपI धापी...मेरी तरह इन सभी का सामना तो आप सब ने कभी न कभी तो किया ही होगा और ज़रूर ही बड़ी बेबाकी से मुह से ये लफ्ज़ भी निकले होंगे... 'रेलवे का तो सिस्टम ही खराब है'..लेकिन ये है बड़ी ही मजेदार तुकबंदी ... एक तो 'सिस्टम'...दूसरी 'खराब' ..!!
और किसी में हो न हो लेकिन देरी से आने के काम में पूरी तरह से वफादार ..! बिलकुल उसी टेलीफोन की कम्पनी वाले स्वान सी ,जो देर सवेर ही सही लेकिन आपकी सेवा को हाज़िर ज़रूर होगी..अजी इस रेल रुपी माया संसार के भी क्या कहने ? इसे नहीं जिया तो क्या ख़ाक जिया ??...तरह-तरह के अदभुत जीवो को खुद में समाये दौड़ने में माहिर ..एक अजीब तरह का प्राणी इसमें घेर के सफ़र करने का तो अपना जन्म सिध्द अधिकार मान बैठा है..आपका भी सामना कभी न कभी उससे ज़रूर हुवा होगा!! ..."रुमाल आरक्षण यात्री" ...देखने में हम और आप जैसा आम भोला भाला इंसान लेकिन भगवान् न करे की इनके तेज़ तेवरों से आपका सामना पड़े...साफ़ भाषा में बोले तो! एम्० एस० टी० धारक यात्री ...जी रूमाल आरक्षण इसलिए ! क्यूँ की इन्हें ट्रेन की खिड़की से रूमाल सीट पैर फेक कर अपनी जगह हथियाने में माहिरता हासिल होती है..इनका रूमाल ही इनका टिकट आरक्षण ..!!...इनकी लीला अक्सर मेमू पैसेंजर ट्रेनों में देखने को मिल जाएगी ...मेमू ट्रेन की लीला और अन्दर का माहोल दोनों के यदि बखान करने बैठ जाये तो सम्पूर्ण ग्रन्थ तैयार  हो जाए...

अजब गज़ब प्रवृत्ति के लोग देखने मिल जायेंगे यहाँ ,जिनको देखकर लाफ्टर शो सा आनंद मिल जायेगा ..जैसे की :एक अकेल अखबार को झांक झांक कर आठ नौ लोगो का पढ़ना ...पान मसाला खा कर 'खिड़की के पास वाली सीट प्राप्त व्यक्ति' के सामने जाकर बाहर पीक मारना और उसे ये जताना की उसने खिड़की वाली जगह हड़पकर कितना बड़ा अपराध कर दिया है ...धार्मिक रूप से चहल पहल वाले दिनों जैसे शनिवार- मंगलवार इत्यादि को कुछ अत्याधिक धार्मिक प्रवृत्ति लोग चिल्ला चिल्ला कर 'रेल' में सुन्दर काण्ड का पठन पाठन भी कर डालते है ,साथ ही साथ कुछ ऐसे भी, जो इसी बहती गंगा में हाँथ धोते चौपाईयों की लय-ताल पर ऊँगली थिरकाते और सर हिलाते, भक्ति करते भी दिख जायेंगे .. कुछ शरारती गाँव के डूड (DUDE) भाई जन जिन्हें अपने नए-नए चायनीज़ सेल फोन पर जलेबी-शीला को नचाये बगैर एक पल भी चैन नहीं मिलता ...इनके बीच कुछ गाँव की भोली मासूम सी औरतें जो अक्सर सीट पर न बैठकर डिब्बे के किसी कोने में उकडू बैठ जाने में ही अपनी भलाई मानती ...डिब्बों की दीवारों में खोद खोद कर उकेरी गयी अभद्र टिप्पणियाँ और गालियाँ ,अगर इनसे भी कुछ का मन न भरे तो वहाँ लगे स्विचों , लाइटों और पंखो तक को उखाड़ देने वाले लोग...

इतना सब कुछ तो सहती है हमारी रेल..!! पर फिर भी साल के तीन सौ पैंसठ दिन बिना किसी शिकायत ,बस चुपचाप मौन रहकर ,अडिग और सहनशील सी बनकर अपने काम में लगे रहने की सीख दे जाती . और यहाँ तक अपने रुकने - दौड़ने की लगाम भी हमारे हाँथ में थमा देती और डिब्बे की हर दूसरी सीट पर लिख देती "गाडी रोकने के लिए ज़ंजीर खींचे" या यूँ कह ले ये वही सिस्टम है जिसे हम इतना कोसते धिक्कारते है और एक तरफ़ा सोच के आवेश में यह भूल जाते की इसे ऐसा गन्दा हम सबने ही बनाया ...यह वही सिस्टम है जो एक तरफ हमें तरक्की की रफ़्तार तो देता है वही दूसरी तरफ इस पर लगाम लगाना भी सिर्फ हमारे बस में कर देता है ...पर समझना तो हमें खुद होगा की हम अपनी जिम्मेदारियों को थोडा-थोडा ही सही पर निभाये ज़रूर ...शायद हमारी इन्ही छोटी-छोटी बूंदों की बचत ही कल किसी प्यासे की प्यास बुझा सके ...सोचे ज़रूर ...!! क्युकी जो व्यवहार हम दूसरो से खुद के लिए नापसंद करते हैं उसे दूसरों के साथ करने में ज़रा भी नहीं हिचकते ...
सोच बदले...और अपनी गैर ज़िम्मेदार आदतों को भी ...शिकायतें करने में नहीं बल्कि उन्हें समझकर दूर करने की कोशिश करने में ही समझदारी है...

1 comment:

  1. worndefull...i like ur writing skills....plzz aise he likte raho..

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