Tuesday, February 15, 2011

"माँ प्यारी माँ "

एक और दिन तुम्हारी मुस्कान के बिन
एक और दिन फिर गुज़र गया
आज जान पाई की तुम्हारी अहमियत
तुम्हारा मेरे साथ होना कितना ज़रूरी था
माँ मैंने चाहा की तुम्हारे लिए हर पल तुम्हारे साथ रह सकू
और हमेशा तुम्हरी आँखों को पढ़ सकू
चाहा की तुम्हारे साथ ही बिताऊ हर बसंत
चाहा की मरू भी तो तुम्हारी ही गोद में
वक़्त की करवट को मैं न रोक पाई मैं माँ
मीलो की दूरियों ने थाम दिया मेरा सफ़र
तुम मेरी ताक़त थी , तुम्हारा साथ भी मेरी मुस्कान का कारन था
तुम साथ थी तो सब कुछ अच्छा था
ऐसा बंधन था तुमसे ,ऐसा रिश्ता था तुमसे
तेरे हांथो की थपकी ही मेरी सारी थकन उतार देती थी
आज तू चुप रहती है ,मुझसे शिकायत भी नहीं करती माँ
मेरी गलतियों प्र न डांटती है और न ही प्यार से
माथा चूमती अब तू मेरा , न गोद पर बिठाती
साथ गुज़ारे वक़्त ने हमारे रिश्ते को और मज़बूत किया था
मेरा दिल थम सा गया ,अब नहीं दुखता
दुःख देता है आज तेरा अनजान बन जाना
सोचती हु की क्या मैं ही न समझ सकी तुम्हे
पर क्या यह वजह काफी थी मुझे खुद से दूर करने के लिए ||

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